बुधवार, 16 मार्च 2011

पूर्वोत्तर के आईने में बदलता बिहार


‘’बिहार बहुत बदल गया है......’’ मणिपुर की राजधानी इम्फाल से पटना मेडिकल कालेज, पी.एम.सी.एच. में बी.डी.एस. की पढाई करने आये प्रमोद सिंह के मुँह से दसियों बार ये वाक्य मेरे उनके बात-चीत के दौरान निकला होगा.
 रात के लगभग एक बजे पटना स्टेशन पर गुवाहाटी आने के लिए भारतीय रेल के सामान्य चार घंटे देरी से चल रही एक रेल नार्थ ईस्ट एक्सप्रेस का उबासी लेते हुए मैं भी इन्तजार कर रहा था. प्लेटफार्म पर तीन चार पूर्वोत्तर के चेहरे को देखकर अनुमान लग गया कि ये सज्जन भी हमारे साथ जाने वाले है.अपने आदत से मजबूर मैंने उनसे पूछ ही दिया....भाई गुवाहाटी जाना है क्या? जबाव आया उससे भी आगे जाना है,इम्फाल. मैंने कहा पटना में कैसे? उन्होंने कहा पढाई करता हूँ.......!
            मेरा मन अंदर से गदगद हुआ.इसका कारण था ! मैंने पिछले डेढ़ वर्ष से पूर्वोत्तर में रहकर यह अनुभव किया कि जबतक पूर्वोत्तर का लगाव बिहार और उत्तर प्रदेश से नहीं होता तब तक कई समस्याएं आतंरिक रूप से बनी रहेंगी.और उसका एक मात्र उपाय है पूर्वोत्तर के युवाओं का पढाई,नौकरी,व्यवसाय या अन्य कारणों से इन क्षेत्रों से जुड़ाव बना रहे.
            पटना से गुवाहाटी के अठारह घंटे के यात्रा में प्रमोद सिंह से मैंने कई सवाल किये.और प्रमोद ने मुझसे. क्यूँ कि मैं भी तों पूर्वोत्तर में उनके ही तरह हूँ. मैंने प्रमोद से पूछा कि पहली बार जब आपको यह पता चला कि आपको बिहार में पढ़ना है तों आपके मन में क्या सबसे बड़ा सवाल था?
हिंदी बोलने के अपने ही अंदाज में थोड़ा सकुचाते हुए लेकिन निश्छलता से प्रमोद ने कहा कि हम तों बिहार का मतलब जानते थे....गन्दा,बदमास,अनपढ़,........
                मुझे प्रमोद के जबाव में......जानते थे.....शब्द ने मेरे अगले सवाल का भी जबाव दे दिया कि अब वो वैसा नहीं देखते.लेकिन क्या देखते है पिछले तीन सालों से...? यही मेरा अगला प्रश्न था.
फिर उनके मुँह से निकला.......बिहार बहुत बदल गया है......हम दोस्त लोग गाँधी मैदान से बारह बजे रात को घूमते हुए आते है.......नए माल्स....शापिंग काम्प्लेक्स.....सड़को पर जगमगाती रौशनी...रात में पहरे देते पुलिस.....सरकारी कार्यालयों में अनुशासन....सबकुछ बदला है.
            प्रमोद के प्रत्येक अनुभव में स्वतः एक सच्चाई की खुशबू आ रही थी.क्योकि वो किसी पार्टी या सरकार के पक्ष में नहीं बोल रहे थे........ वे एक सहज अनुभव बयान कर रहे थे.
      बीच में सहयात्री के परंपरा का निर्वाह करते हुए उन्होंने मेरे पूर्वोत्तर और विशेष कर मणिपुर के अनुभव को भी सुनना चाहा.....मैंने भी अपना कर्त्तव्य पालन ईमानदारी से किया.
      मेरा अगला प्रश्न प्रमोद से बिहार के लोगों के बारे में था.मैंने पूछा कि लोगों का आपके प्रति और उनका स्वाभाविक व्यव्हार कैसा अनुभव किया आपने? हँसते हुए उन्होंने बताया कि लोग मेरे चेहरे से मुझे कई बार नेपाली,जापानी या चाइनीज सोचते है.लेकिन मुझे उससे कोई दुःख नहीं होता.....गंभीर होते हुए प्रमोद ने बताया कि बहुत दुःख होता है जब पूछने पर मैं बताता हूँ कि मेरा घर इम्फाल है तों अगला सवाल होता है कि इम्फाल किस देश में है?  ......लेकिन पटना को तों मणिपुर में सब जनता है.......प्रमोद के वाक्य थे!
      मैं स्वयं २०१० के फरवरी में पटना में पूर्वोत्तर के एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान प्रेस से मुखातिब होते हुए ऐसे ही सवाल झेल चूका था कि गंगटोक जाने में भारत से कितना समय लगता है? आदि.इसीलिए प्रमोद से पूछे जाने वाले ऐसे सवालों के बारे में मैं आश्वस्त था.
      अब आम लोगों के जीवनशैली और व्यव्हार के बारे में मेरी जिज्ञासा हुई.प्रमोद के शब्दों में मार्मकता बढती गई और आवाज का भारीपन भी.....उनके शब्द थे .... मैं समझ नहीं पता हूँ कि बिहार के अतीत और वर्तमान में इतना बड़ा खाई कैसे पैदा हुआ.....जिसने दुनिया को बौद्ध और महावीर जैसे  वैचारिक आधार दिया हो...मौर्य शासन का आदर्श दिया हो...उसकी ये दशा कैसे हुई.?....आज भी बिहार में जातिय भेद दैनिक जीवन यापन के स्तर से पता चल जाता है....एक ही समाज में रहने वाला दो व्यक्तियों के हैसियत में इतना बड़ा अंतर कैसे है.....और यह कम क्यों नहीं होता......लोग दहेज को क्यों नहीं समाप्त कर देते....शिक्षित लोग बिहार से पलायन क्यों करते है? ......आदि
    मैं चुप-चाप सुन रहा था क्यूँ कि मुझे पता है कि मणिपुर में समाज के अंदर ये बुराइयां नहीं के बराबर है.वहां समस्या दूसरे तरह की है.गरीबी है परन्तु भिक्षाटन का पेशा नहीं है......अपने कला-संस्कृति के प्रति लोग सजग है....जीवन यापन के सामान्य व्यव्हार में साफ-सफाई है ...जिससे बीमारियाँ कम है.
      लेकिन प्रमोद अगले ही छन आशा भरी मुस्कान लिए कहता है कि....... बिहार के लोग आदर बहुत करते है....खाना-पीना में व्यंजन हमसे कही ज्यादा है बिहार में.....और सबसे बड़ी बात कि सामान  सस्ता बहुत है.....
  अब प्रमोद पटना मेडिकल कालेज में प्रेक्टिस भी करते है....मरीजों का बिहारी हिंदी उन्हें बहुत पसंद है...अब वे खुद बहुत अच्छी हिंदी बोलते है...भोजपुरी फिल्म और गाने से भी प्रमोद परहेज नहीं रख पाते...बिहार में रहने का मौका मिले तों खुशी से रह सकते है....लेकिन बिहारी लड़की से शादी उनको असंभव लगता है...क्यों कि लड़कियां बात ही नहीं करती......ये बहुत मुश्किल काम है भाई.....प्रमोद लजाते हुए बोल गए.....
            गुवाहाटी स्टेशन से हम दोनों दो रास्ते हो लिए..... इस उम्मीद के साथ कि दुनिया गोल है फिर मिलेंगे.......!
लेकिन मेरे मन में बिहार के बदलाव में वहां के लोगों के शिष्टाचार और व्यव्हार के बदलाव का प्रश्न अभी भी निरुत्तर है.
महादेवी वर्मा भारतीय संस्कृति के स्वर पुस्तक में लिखती है कि किसी मनुष्य-समूह के साहित्य,कला,दर्शन आदि के संचित ज्ञान और भाव का ऐश्वर्य ही उसकी संस्कृति का परिचायक नहीं, उस समूह के प्रत्येक व्यक्ति का साधारण शिष्टाचार भी उसका परिचय देने में समर्थ है. 


राजीव पाठक
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1 टिप्पणी:

  1. vihar to teji se vikash kar raha hai lekin kya bhautik vikash hi bharat hai sarkar ne saraswati bandanaa aur saraswati puza par pratibandh laga diya hai -------- pakistan bhi bharat me tha kyo alag hua.

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