गुरुवार, 20 मई 2010

जीवन में नया रंग भरता है:बिहू


"झमाझम बारिश,ढोल की थाप,पेपा का शोर और असम के पारंपरिक परिधानों से सजे युवकों के बीच (जनमनी) युवती का सुन्दर नृत्य" इन सभी बातो पर दिल्ली के 45 डिग्री वाले तापमान में रहकर विश्वास नहीं किया जा सकता,किन्तु असम में पिछले महीने भर से यही नजारा देखने को मिल रहा था. बिहू का उत्सव जो चल रहा था.घरो में जाने पर चावल,तिल,गुर और नारियल से बने पीठा खाने की आग्रह न हो,ये हो ही नहीं सकता,साथ ही तामुल(पान,सुपारी) और असमिया फुलोमा गमछा से सम्मान कैसे भुला जा सकता है.


बिहू के शुरू होने से पहले दुकानों और बाजारों में भीड़,जगह-जगह विज्ञापन के होर्डिंगो में बिहू शुभकामना, दिल्ली की दीपावली याद आ गई,लेकिन नज़ारे अलग थे.जो पहले कभी देखा न था.तो चला कुछ जानने और आनंद लेने.

यूँ तो वर्ष भर में तीन बिहू होता है,जिसमे रंगली बिहू नव वर्ष वैशाख के आगमन पर मनाया जाता है.इसी समय मणिपुर में चैरौबा,त्रिपुरा और बंगाल में पोइला(पहला) वैशाख,बिहार में सत्तू और देश के अन्य राज्यों में वैशाखी नाम से भारतीय नव वर्ष का आगमन होता है.दुर्भाग्य वश पश्चिमी रंग में डूब कर 1 जनवरी को हम अपना नव वर्ष मान बैठते है. जिसका कोई न तो वैज्ञानिक आधार है ना ही भारतीय सन्दर्भ में कोई औचित्य.लेकिन पर्व के रूप में ही सही,प्रकृति के बदलाव में ही सही पूरे भारत में नूतन वर्ष मनता है.वैसाख में भी.

शहरी करण ने बिहू जैसे पारंपरिक नृत्य को भी व्यावासिक बना दिया है.अतः वास्तविक बिहू का नजारा गाँव में ही मिलता है.मै भी असम में बिहू के लिए प्रसिद्द शिवसागर जिला जा पहुंचा.

बिहू में लगभग हर जगह नृत्य की प्रतियोगिता होती है,जयसागर(स्थान) के केंद्रीय रंगली बिहू उत्सव के मंच पर उस रात विजेता टीमों की घोषणा होनी थी और फिर उनका अंतिम कार्यक्रम.

अगले दिन हम आमंत्रित थे शिवसागर के कलुगाँव के बिहू समापन समारोह में.मन झूम उठा ढोल,पेपा(मवेशी के सिंघ से बना बाजा),और बांस से बने वाद्य यंत्रो के मिले स्वर को सुनकर.

लेकिन कुछ सवाल मन में सहज ही उठे,जब मै पूर्वोत्तर की तुलना भारत के अन्य भागों से करना चाहा.बिहू के मंच पर तीन पीढियां एक साथ एक ही रंग और उमंग में नाचती है,ये भारत में और कहीं दीखता है क्या? पचहत्तरवा बिहू मानाने के लिए एक सेवानिवृत शिक्षक जनमानी(औरत) बनकर नाचते है और दर्शक दीर्घा में बैठे उनका बेटा अगले वर्ष फिर उनके मंचीय कार्यक्रम को देखने हेतु भगवन से स्वस्थ्य कामना करता है.चार वर्ष के अपने बेटी के नृत्य का विडिओ दिखाते डी.आर.डी.ए के एक इंजीनियर प्रसन्न होकर मुझे बताते है कि उनकी बेटी इस बिहू में पाँच मंचो से बिहू नृत्य कि प्रस्तुति की है.मेरे पूछने पर कि गुडिया को बिहू नाचना किसने सिखाया,उन्होंने अपनी पत्नी के तरफ इशारा करते हुए कहा कि ये जिम्मेदारी तो इन्ही कि बनती है.क्या बेटी को परदे के पीछे कि वस्तु समझने वाले जगहों में इस प्रतिभा का गला नहीं घोट दिया जाता है?

थोडा और अटपटा लगे जब मणिपुर के थौबल-चौबा नृत्य के बारे में आप जाने.इस नृत्य का आयोजन जिस मोहल्ले में होता है उस मोहल्ले के सभी लड़के कार्यक्रम कि तैयारी करते है लेकिन शाम होने पर नृत्य में उस मोहल्ले की सिर्फ अविवाहित लड़कियां और दुसरे मोहल्ले से या बाहर से आये लड़के ही नाचते है.नाचते हुए यदि बात बन गई तो शादी पक्की.लेकिन ये आयोजन अश्लीलता का नहीं अपितु वैचारिक स्वतंत्रता को दर्शाता है,जो अन्य कही नहीं है.

वास्तव में ये पर्व-त्यौहार हमें जीवन जीने हेतु नई उर्जा और उत्साह प्रदान करते है,लेकिन जरुरत इसको मूल रूप में मानाने की है,नहीं तो होली से दीपावली तक शराब ,न्यू इयर से गुड फ्राइदे तक शराब.फिर कल कर्ज का दिन गुलामी की मानसिकता.ना रंग,ना रास ,ना ही जीवन का उल्लाश.





राजीव पाठक

पूर्वोत्तर भारत

rajeevpathak@journalist.com

4 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया है। जीवन में नया रंग भरते रहें ...
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