सोमवार, 31 मई 2010

'पूर्वोत्तर में हिंदी प्रेम'

मै जब अगस्त 2009 में दिल्ली से पूर्वोत्तर के लिए निकल रहा था तो सबसे ज्यादा जिज्ञासा और चिंता भाषा को लेकर थी.क्यों कि मैंने हिंदी भाषियों के साथ होने वाले तथाकथित दुर्व्यवहार के बारे में सुना था, पूर्वोत्तर में अंग्रेजी ही चलता है.ऐसा भी सुना था.यानि कुल मिलकर विश्वाश हो गया था कि स्थिति नाजुक है?
लेकिन वास्तविकता इन झूठे और अनुभवहीन दलीलों से भिन्न है.मै पूर्वोत्तर के हिंदी प्रेम की कहानी कहूँ,उससे पूर्व आपको बताना उचित समझता हूँ कि जो लोग इस प्रकार का अफवाह उड़ाते है कि पूर्वोत्तर में हिंदी भाषियों का अपमान होता है या हिंदी नहीं पढ़ी-लिखी जाती है.उसमे अधिकांश बंगलादेशी घुसपैठ समर्थित लोग या धर्मान्तरण को और सरल करने हेतु मिशनरी स्कुल खोलने के समर्थक लोग है.जो सरकार का ध्यान अपने ऊपर से हटाकर निर्दोष हिंदी भाषियों की हत्या करके उसे ज्यादा गंभीर मुद्दा बना देते है.परिणाम उन कुटिलो के योजना अनुरूप निकलता है.सरकार मामले की जाँच करबाने में व्यस्त हो जाती है.
मुझे पूर्वोत्तर में आये अब साल भर होने वाला है.मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि मेरी बात को कोई इसलिए नहीं समझा क्यों कि मै हिंदी में बोल रहा हूँ.या मेरे किसी काम में हिंदी रुकाबट बनी हो.बल्कि इसके विपरीत हिंदी के प्रति सब प्रकार के सम्मान और सहज व्यव्हार में हिंदी का प्रयोग ग्रामीण अंचलों तक मैंने देखा है. पूर्वोत्तर में हिंदी के प्रति अगाध प्रेम को आप अरुणाचल प्रदेश जाकर देख सकते है.जहाँ लगभग 30 जनजातियाँ निवास करती है लेकिन सामान्य बोल-चाल और प्रशासकिये कामो में हिंदी ही प्रयोग किया जाता है. अरुणाचल के सभी विद्यालयों में हिंदी अनिवार्य विषय के रूप में पढाई जाती है साथ ही उच्च शिक्षा में भी हिंदी विषय की पढाई लोकप्रिय है. मणिपुर में राष्ट्र विरोधी ताकतों ने हिंदी सिनेमा देखने पर कई बार उत्पात मचाया परन्तु मणिपुर के कई युवाओं ने इसका विरोध किया और वर्त्तमान में वहा किडियन सिनेमा का प्रचलन ख़त्म हो रहा है, आज युवा हिंदी बोलते और हिंदी गीत गुनगुनाते मिलते है.मिजोरम और नागालैंड में विदेशी षड़यंत्र को समय रहते नहीं समझा गया,जिसके परिणामस्वरूप आज वहां की स्थानीय भाषा भी विलुप्त होने के कगार पर है.परन्तु युवाओं का वहा से बाहर निकलना इस परिस्थिति में सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है.क्यों कि उन्हें बाहर निकलने से पता चलता है कि हम हिदुस्थानी है.और हिंदी बोलना हमारे लिए गर्व कि बात है.यही हाल मेघालय के साथ भी है.मेघालय के अधिकांश जनजातियों के भाषा का लिपि छल पूर्वक रोमन कर दिया गया.लेकिन सेंग-खासी जैसे राष्ट्रवादी सोच के लोगो ने अपने को देश के मूल धारा से जुड़ने हेतु हिंदी को व्यव्हार में लाना शुरू कर दिया है. त्रिपुरा में बंगला भाषी लोग ज्यादा है.अतः हिंदी समझने और बोलने में कोई परेशानी नहीं है.परन्तु जिस प्रदेश को अक्सर हिंदी विरोध के लिए ख़बरों में सुना जाता है वो असम है.लेकिन वास्तविकता ये है कि हिंदी  की सायद ही कोई फिल्म हो जो उसी दिन यहाँ के सिनेमा घरों में ना लग जाता हो जिस दिन वो रिलीज हुआ हो. हिंदी सीरियल की पूरी कहानी आपको कोई भी स्कूली बच्ची बता देगी.आपको सुबह-सुबह किसी भी अख़बार के दुकान पर चार-पाँच हिंदी अख़बार टंगे दिख जायेंगे.सायद ही कोई कालेज में पढने वाला विद्यार्थी आपको हिंदी ना बोलता नजर आये.और सबसे आनंद तो मुझे तब होता है जब मै टूटी-फूटी असमिया में किसी से बात करना चाहता हूँ और वो मुझे हँस कर कहता है,मुझे हिंदी बोलने आती है आप हिंदी में ही बात करें. आप जानकर खुश होंगे कि असम की ही एक जनजाति 'बोरो' का भाषा तो अलग है परन्तु लिपि देवनागरी ही है.
इन सब तथ्यों को जानकर क्या आप कह सकेंगे कि पूर्वोत्तर के ऐसे लोगो में हिंदी के प्रति स्नेह नहीं है जो यहाँ के भूमि पुत्र है? वास्तव में हम आज भी सेवा और शिक्षा का स्वांग रचकर भारत में घुश्पैठ कर रहे राष्ट्र विरोधी ताकतों को पहचान नहीं रहे है,या पहचान कर भी चुप बैठे है.जिसका परिणाम गंभीर हो सकता है.यह प्रत्येक देशवाशियों के लिए एक विचारणीय विषय है.

राजीव पाठक
पूर्वोत्तर भारत
rajeevpathak@journalist.com

3 टिप्‍पणियां:

  1. bahut sunder Rajeev jee! Aapka blog adyatan jankariyon se paripoorna hai.

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  2. आज दिनांक 4 जून 2010 के दैनिक जनसत्‍ता में संपादकीय पेज 6 पर समांतर स्‍तंभ में आपकी यह पोस्‍ट पूर्वोत्‍तर में हिंदी शीर्षक से प्रकाशित हुई है, बधाई। स्‍कैनबिम्‍ब के लिए http://blogonprint.blogspot.com/ इस लिंक पर आइये।

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  3. दैनिक जानसत्ता के पूर्वोत्तर क्षेत्र की ओर ध्यान आकर्षण के लिए कोटि-कोटि साधुवाद.

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