सोमवार, 7 नवंबर 2016

लोक आस्था का महापर्व छठ पूजा वैश्विक हो गया ।

उदेती सविता ताम्र:
ताम्रामेवाअस्तानमेति च
संपतौ च विपत्तो च 
महताँम एक रूपतः ।
अर्थात : उगता हुआ सूर्य लाल होता है और अस्त होता हुआ भी । ऐसे ही विवेकी मनुष्य को जीवन के सुख और दुःख दोनों समय में समभाव रहना चाहिए ।

वैदिक काल के सूर्य उपासना को लोक पर्व के रूप में स्वयं भगवान राम प्रचलन में लाये ऐसी कथा है। ऐसी मान्यता है कि भगवान राम जिस दिन अयोध्या आये उसके छः दिन बाद अर्थात दीपावली के छठे दिन उन्होंने प्रजा के सुख और समृद्धि के लिए यह व्रत रखा । छठ के बारे में कई अन्य कथाएं भी प्रचलित है । लेकिन सबमें भाव एक ही है, सबके लिए निरोग काया और समृद्धि की कामना । यह पर्व सबके कल्याण और मंगल के लिए है ।
एक कहावत आपने भी कभी कही या सुनी होगी, "डूबते सूर्य को कोई प्रणाम नहीं करता" । लेकिन यहाँ डूबते सूर्य को प्रणाम किया जाता है, इस उम्मीद के साथ कि लंबी अँधेरी रात के बाद पुनः सूर्य का उदय होगा । जीवन सूर्य से है । सूर्य सनातन परंपरा के आदि देव हैं ।
समय बदला तो देश-दुनिया में छठ के प्रति लोगों की जिज्ञासा भी बढ़ी । बिहार केंद्रित यह पर्व सर्वदूर चर्चा में है । भारत के प्रधानमंत्री छठ पर ट्वीट कर बधाई देते हैं, दिल्ली के हर मोहल्ले में छठ पार्क है, मॉरीशस, सूरीनाम ही नहीं कनाडा और रूस में भी छठ करते व्रती अपनी फोटो सोशल मीडिया पर डाल रहे हैं । मैंने खुद पूर्वोत्तर के सुदूर अरुणाचल प्रदेश में छठ का उत्साह और असम के ब्रम्हपुत्र के तट पर छठी मईया के संगीत को सुना है ।
छठ पर्व पूजा से बढ़कर प्रकृति के प्रति संवेदना और सामाजिक समरसता का ताना-बाना है । छठ से पहले नदी, तालाब और घर-खलिहान की सफाई से लेकर मौसम के अन्न और औषधि की पूजा में उपयोगिता आडम्बर से दूर भारत के ग्राम्य जीवन के सादगी का परिचायक है ।
जाति भेद से दूर इस पर्व में सामाजिक विभेद को मिटाने की क्षमता है । सबके मंगल जीवन की कामना वाला छठ पूजा अब सर्वस्पर्शी हो चला है ।

राजीव पाठक
+919910607093

रविवार, 4 सितंबर 2016

ये हिंदुत्व का जादू ही तो है |



1995 की घटना है, लंदन में स्वामीनारायण संप्रदाय वालों ने अक्षरधाम की तरह ही एक भव्य मंदिर बनाया था. स्वामीनारायण वालों की विशेषता है कि वो अपने मंदिरों के साथ जुड़े संग्रहालय में हिन्दू संस्कृति और इतिहास का परिचय कराने वाली मूर्तियाँ, कलाकृतियाँ आदि भी लगाते हैं. लंदन के मंदिर में स्वामीनारायण पंथ के सन्यासियों ने एक दिन वहां के मेयर को आमंत्रित किया. मदिर में दर्शन करने के पश्चात् वो मेयर मंदिर के साथ लगे संग्रहालय भी देखने गये. वहां पर रामायण को चित्रित करती तस्वीरें लगी थी. इन तस्वीरों का अवलोकन करते-करते वो मेयर श्रवण कुमार की उस तस्वीर के सामने रूक गये जिसमें श्रवण अपने बूढ़े अंधे माता-पिता को बहंगी में उठाये हुए हैं. मेयर साहब ने साथ चल रहे संन्यासी से पूछा कि तस्वीर में दिख रहा ये युवक कौन है और क्या कर रहा है? संन्यासी ने उन्हें बताया कि ये हमारे रामायण काल का एक युवक श्रवण है जिसके माता-पिता वृद्ध और अंधे थे. उसके माता-पिता की तीर्थाटन की इच्छा हुई तो श्रवण ने उन्हें बहंगी में बिठाकर सारे भारतवर्ष का तीर्थाटन कराया. सुनकर मेयर हतप्रभ रह गया, उनके मुंह से निकला, क्या ये संभव है कि एक नवयुवक जिसकी अभी मौज-मस्ती करने की उम्र है वो इस तरह से अपने वृद्ध और अंधे माता-पिता को तीर्थयात्रा करवा रहा है? शायद मेयर साहब की आँखों के सामने इंग्लैंड में खुले हुए ढ़ेरों वृद्धाश्रम के दृश्य घूम गये. संभवतः उन्हें ये भी पता था कि उनके इंग्लैंड में जब माँ-बाप बूढ़े हो जाते हैं तो बच्चों को लगता है कि ये डिस्टर्ब करते हैं इसलिये वो उन्हें ओल्ड-एज-होम में छोड़ आते हैं और इसलिये उस मंदिर से वापस आने के बाद उस मेयर ने फ़ौरन वहां के स्कूलों के लिए एक सर्कुलर निकाला कि रविवार को अपने बच्चों को स्वामीनारायण मंदिर में लेकर जाओ ताकि वो सीख सकें कि हिन्दू धर्म क्या है, हिन्दू जीवन-मूल्य क्या है.
यही वो कारण है जिसके चलते हिन्दू धर्म और भारत भूमि युगों-युगों से सबकी अंतिम आश्रयस्थली रही है. विष्णु पुराण कहता है,
गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ये भारतभूमि भागे,
स्वार्गापवर्गास्पदहेतुभूते भवन्ति भूयः पुरुषा सुरत्वात ।
अर्थात्, “हम देवताओं में भी वो लोग धन्य हैं जो स्वर्ग और अपवर्ग के लिए साधनभूत भारत भूमि में उत्पन्न हुए हैं.”
पर हरेक को इस भारत-भूमि और इस पवित्र धर्म में जन्म लेने का सौभाग्य नहीं मिलता इसलिये जिसने भी प्रकृति या परमशक्ति के साथ खुद को जोड़ा वह सहज रूप से इस ओर खिंचा चला आता है. स्वामी विवेकानंद ने कहा था, “यदि पृथिवी पर कोई ऐसी भूमि है, जिसे मंगलदायनी पुण्यभूमि कहा जा सकता है, जहाँ ईश्वर की ओर अग्रसर होने वाली प्रत्येक आत्मा को अपना अंतिम आश्रयस्थल प्राप्त करने के लिए जाना ही पड़ता है, तो वो भारत है.”
स्वामी जी के इस कथन का साक्ष्य समय-समय पर मिलता रहा है. कहतें हैं एक बार एक जर्मन इस भारत भूमि पर अपनी आध्यात्मिक पिपासाओं को शांत करने आया था. उसने इस देश के ऋषि-मुनियों के चरणों में बैठ कर लम्बे समय तक साधनाएं की पर ईश्वर का साक्षात्कार नहीं कर पाया. उसे यही लगा कि उसका शरीर और मन जो बर्षों-बरस तक पश्चिम के तमोगुणी संस्कारों में रहा और पला है इस कारण वह ईश्वर का साक्षात्कार और अपने अंतःस्थ में उसकी अनुभूति नहीं कर पा रहा है. वह हरिद्वार गया पवित्र गंगा में जल समाधि ले ली. अपने पीछे वो एक पत्र छोड़ कर गया, जिसमें उसने लिखा, -“मैं स्वयं अपने शरीर का त्याग कर रहा हूँ. गंगा के पावन जल में अपने शरीर को अर्पित करने से उस मंगलमय की कृपा से मुझे भारत में पुनर्जन्म का सौभाग्य प्राप्त हो और उस नवीन निर्मल शरीर से मैं ईश्वर का साक्षात्कार करने योग्य हो जाऊं.”
उस जर्मन ईसाई की ही तरह दुनिया के अलग-अलग मत-मजहबों में जन्मी आत्माएँ पवित्र हिन्दू धर्म और भारत भूमि की ओर इसी तरह खींची चली आती है पर हम हिन्दू मत-विस्तार को किसी को अपने भीतर लाने को विजय-घोषणा के रूप में प्रचारित नहीं करते इसलिये ऐसी विभूतियों का साक्षात्कार हमें नहीं हो पाता. आज कृष्ण-जन्माष्टमी के पावन पर्व पर बनारस से मित्र संतोष सिंह ने ऐसे ही एक अध्यात्म-पिपासु भारत भक्त और प्रकृति के सहज धर्म हिंदुत्व के उपासक श्री फ्रेड रोनाल्ड के बारे में बताया और उनकी तस्वीर भेजी (संलग्न) . श्री रोनाल्ड मूल रूप से एरिज़ोना, अमेरिका से हैं, इन्वेस्टमेंट एनालिस्ट के रूप में अच्छे तरीके से जीवन-यापन कर रहे थे साथ ही ईसाई मत का अनुपालन भी करते थे पर चर्च की शिक्षाएं उनके आध्यात्मिक मन को ईसाईयत के साथ बांध कर नहीं रख सकी. ईसाईयत के साथ उन्होंने सेमेटिक के बाकी शाखों का भी अध्ययन किया पर वहां भी उन्हें अतिवाद, संकुचन और संकीर्णता ही मिली. 2008 में किसी हिन्दू संन्यासी को माध्यम बनाकर विधाता ने उन्हें प्रकृति के सहज धर्म हिंदुत्व और उपासना-स्थली भारत की ओर मोड़ दिया. जब भारत और हिंदुत्व से मिले तो लगा, यार यही तो वो था जिसकी तलाश में मैं बरसों से था. यही तो है जहाँ अंध-आस्था और उन्माद नहीं बल्कि अनुभूति की प्रधानता है. जिस चीज़ की चाह थी वो मिली तो उसे पाने के बाद फिर हिंदुत्व और भारत के ही होकर रह गये. उन्हें समझ में आ गया था कि क्यों प्रभु ईसा ने अपनी अंतिम राह भारत की ओर लिया था.
आज ब्रज के उस ग्वाल-बाल के कंठ से निकली अमर गीता वाणी पश्चिम के विश्वविद्यालयों में गूँज रही है, राम का चरित्र वहां के परिवार को जोड़ रहा है और श्रवण की कथाएं माता-पिता का सम्मान सिखा रही है, हिन्दू जीवन-दर्शन, हिन्दू-चिंतन श्री फ्रेड जैसी न जाने कितनी पुण्यात्माओं के लिये अपना जन्म सफल करने का कारण बन रही हैं . ये हिंदुत्व का जादू नहीं है तो और क्या है जो आज सारी दुनिया में सर चढ़ कर बोल रहा है.
चलते-चलते ये भी बता रहा हूँ कि श्री फ्रेड रोनाल्ड ने अपने पुत्र का नाम "कृष्ण" रखा है.
साभार : अभिजीत कुमार 
https://www.facebook.com/abhijeet.singh.370/posts/1159858150745144

सोमवार, 21 सितंबर 2015

‪‎महाभारत‬ का युद्ध 13 अक्टूबर 3139 ई. पू. को आरम्भ हुआ |


 “ऋग्वेद से रोबोटिक्स तक सांस्कृतिक निरंतरता” : एक अद्भुत प्रदर्शनी । 

इस प्रदर्शनी के माध्यम से इतिहास को वैज्ञानिक रूप से प्रदर्शित किया गया है, जिसमे पिछले 10000 वर्षों से भारत में ही निरंतर विकसित होती वैदिक संस्कृति एवं सभ्यता को उजागर किया गया।
प्रदर्शनी में दिखाए ‪#‎ऋग्वेद‬ के खगोलीये सन्दर्भो के आकाशीय दृश्य 7000 - 6000 वर्ष ई पूर्व आकाश में देखे जा सकते थेI वाल्मीकीय रामायण के आकाशीय सन्दर्भों का सम्बन्ध 7000 वर्ष ई पूर्व से बताया गयाI श्री राम की जन्म तिथि 10 जनवरी 5014 वर्ष ई पूर्व से हनुमान के अशोक वाटिका में सीता जी से मिलने की तिथि 12 सितम्बर 5076 वर्ष ई पूर्व तक के क्रमिक आकाशीय दृश्य दिखाए गए हैI प्रदर्शनी में महभारत युद्ध के आरम्भ की तिथि 13 अक्टूबर 3139 वर्ष ई पूर्व दिखाई गयी है और सम्बंधित घटनाओ के 10 आकाशीय चित्र क्रम से दिखाये गए हैI
श्री ‪#‎राम‬ द्वारा वनवास के दौरान देखे गए 150 से अधिक स्थलों को दर्शाता मानचित्र देखें। दण्डक वन की वो गुफाएं देखें जिनमे 7000 वर्ष पुराने अनाज के दाने मिले हैं। इस प्रदर्शनी में आई - सर्व ने गंगा, सरस्वती, तथा सिंधु क्षेत्रों के पुरातात्विक उत्खननों को बखूबी दिखलाया है। उत्खनित सामग्री तथा कलाकृतियों मंय शामिल हैं बर्तन, आभूषण, खिलौने, अर्ध-कीमती पत्थर जिनका संबंध 9000 से 5000 वर्ष पहले की संस्कृति से है परन्तु आधुनिक काल तक निरंतरता भी स्पष्ट दिखायी देती है।
प्रदर्शनी के उद्घाटन समारोह में आई-सर्व की निदेशिका श्रीमती सरोज बाला ने बताया कि 10 वर्ष तक वैज्ञानिक अनुसन्धान के पश्चात यह निष्कर्ष निकाला गया है कि ‪#‎रामायण‬और महाभारत में उस युग की घटनाओं कि तिथियाँ निहित हैं तथा अनुवांशिक अध्ययनों ने सिद्ध किया है कि मध्य एशिया से किसी आर्यों का भारत में आगमन नहीं हुआ अपितु भारत के आर्य लोग पिछले 8000 वर्षो से विदेशो में जाते आते रहेI
सरस्वती की जगह सर्वन्दित महानदी का स्थान गंगा को कब, कैसे और क्यों मिला; इस प्रश्न का उत्तर तथ्यों के आधार पर दिखाया गया हैI सूर्यवंशी राजाओ की वंशावली में श्री राम के 63 पूर्वज तथा 59 अग्रजों के नाम शामिल हैI इस प्रदर्शनी के द्वारा अनुवांशिक अध्ययनों से सहसंबंध भी दिखाया गया है जो कि इस बात को झुठलाता है के भारत में कभी भी आर्यों का बाहर से आगमन हुआ।

सोनल मानसिंह ने अपने उद्घाटन भाषण में भारत के प्राचीन ऐतिहासिक स्थलों की बदतर हालत पर चिंता प्रकट की तथा विदेंशों में हिंदुत्व के बारे में फैलाय जाने वाले भ्रम को दूर करने के लिए समुचित प्रबंध करने की आवश्यकता पर जोर दिया I
भारत के ‪‎संस्कृति‬ व ‪‎पर्यटन‬ मंत्री श्री महेश शर्मा जी ने आई-सर्व के द्वारा आयोजित प्रदर्शनी की सराहना करते हुए कहा कि प्रदर्शित वैज्ञानिक तथ्यों एवं साक्ष्यों के माध्यम से युवक युवतियों को विश्वास हो जायेगा कि रामायण तथा महाभारत कोई काल्पनिक उपन्यास नहीं है अपितु भारत की प्राचीन ऐतिहासिक घटनाओं का संकलन है।
श्री कृष्ण गोपाल जी ने कहा कि आज से 100 वर्ष पहले ईसाई धारणा थी कि धरती की सरचना 4004 ई. पू. हुई और उसी समय के भीतर सब एतिहासिक घटनाओ को पिरो दिया गया I कौन सोच सकता था कि आज वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर ऋग्वेद से आज तक 10000 वर्षों की भारतीय संस्कृति की निरतरता सिद्ध हो जाएगी।

साभार : आई-सर्व  
राजीव पाठक 
+919910607093 

बुधवार, 5 अगस्त 2015

बुद्धि और विवेक एक दूसरे के विपरीत है : भगवान श्री कृष्णा

बुद्धि और विवेक दो समान अर्थ वाले शब्द लगते हैं, लेकिन स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने इसका विस्तार से वर्णन करते हुए बताया है कि बुद्धि और विवेक एक दूसरे के विपरीत है ।
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श्रीमद भगवत गीता में इसका कोई स्पष्ट वर्णन नहीं है, परन्तु एक रोचक कथा कृष्ण-अर्जुन संवाद के बारे में मैंने सुनी है । इसे कई मित्रों को प्रसंग वस साझा भी किया है । कथा इस प्रकार है कि
" महाभारत का युद्ध आरम्भ होने को था । अर्जुन को भगवान श्री कृष्ण ने अपना विराट रूप दर्शन करवाया और पूछा, हे नर श्रेष्ठ कोई और प्रश्न ? अर्जुन ने शांत भाव से करबद्ध प्रार्थना करते हुए श्री कृष्ण से कहा कि बस मेरे अंतिम प्रश्न का उत्तर दे दीजिये । भगवान मुस्कुराते हुए बोले पूछो, क्या जानना चाहते हो ! अर्जुन ने कहा, प्रभु जब आप सब कुछ जानते हो, अंतर्यामी हो, भविष्य द्रष्टा हो फिर तो आप मेरे मन के प्रश्न और व्याकुलता को भी पहले हैं जान गए होंगे । परन्तु आपने मेरे पहले हीं प्रश्न पर सबकुछ क्यों नहीं बता दिया ?
भगवान समझ गए कि अब अर्जुन को सही उत्तर बताने का समय आ गया है । श्री कृष्ण मुस्कुराते हुए बोले, हे अर्जुन मनुष्य के मन का सञ्चालन दो दिशाओं में होता है । जब उसकी बुद्धि काम करती है तो वह स्वयं को श्रेष्ठ मानते हुए अन्य सबको तुक्ष समझने लगता है और धीरे-धीरे विवेक पूर्ण निर्णयों से कब दूर हो जाता है उसे पता भी नहीं चलता । अधिकांश मानव जीवन के अंतिम समय में भी यह नहीं समझ पाते कि उनके किस निर्णय ने उनका जीवन कष्टप्रद बना दिया और उस निर्णय के समय वह विवेक शुन्य हो गया था ।
भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को स्नेह करते हुए बताया कि स्मरण रखो कि बुद्धि और विवेक दोनों विपरीत दिशा के गामी हैं । जिस समय तुम्हारी बुद्धि काम करती है उस समय तुम स्वकेंद्रित सोचते हो और जिस समय तुम विवेक से निर्णय लेते हो उस समय तुम परोपकार की भी सोचते हो । यह मैं और हम जैसा है । हे अर्जुन अब तक तुम बुद्धि से प्रश्न कर रहे थे और यह तुम्हारा अंतिम प्रश्न विवेक पर आधारित था ।
सामान्य मानव भी तुम्हारी तरह ही होता है इसीलिए मैंने तुम्हारे सरे प्रश्नों का उत्तर दिया । जब भी किसी को दुविधा हो वह तुम्हारे किये हुए प्रश्नो को और मेरे उत्तर का अध्ययन करे वह विवेकी हो जायेगा ।
राजीव पाठक

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015

जहां शिव को त्रिपुरारी के नाम से पुकारा गया !


पूर्वोत्तर भारत का छोटा सा राज्य त्रिपुरा ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी रहा है. त्रिपुरा का बडा पुराना और लंबा इतिहास है. इसकी अपनी अनोखी जनजातीय संस्‍कृति तथा सुसंस्कृत लोकगाथाएं है. रामायण और महाभारतकालीन साक्ष्य आज भी त्रिपुरा के राजमहल संग्रहालय में सुरक्षित है. शक्ति के इक्यावन पीठों में से एक त्रिपुरेश्वरी (त्रिपुर सुंदरी) देवी का मंदिर वहीँ हैं. राजा त्रिपुर का वैभव और अशोक का पदचिन्ह भी अभी मिटा नहीं है. मुगलों से लोहा लेने वाले भूमि पुत्रों की निशानियाँ आज भी कायम है. लेकिन आज का त्रिपुरा जिस स्थिति में है उसे जानना भी जरुरी है. आइये आपको शिव - शक्ति की नगरी का दर्शन करवा दें.
                    
भारत के पूर्वी भुजा का दक्षिणी छोर जहाँ बंगाल की खाड़ी से अनंत जलराशि को स्पर्श करना चाहता है यही शिव और शक्ति की भूमि त्रिपुरा है. त्रिपुरा बांग्‍लादेश तथा म्‍यांमार की नदी घाटियों के बीच स्थित है. इसके तीन तरफ बांग्‍लादेश है और केवल उत्तर-पूर्व में यह असम और मिजोरम से जुड़ा हुआ है.
        महाभारत सहित कई धार्मिक-सांस्कृतिक ग्रंथों में जिन स्थानों का प्रमुखता से वर्णन है उसमें त्रिपुरा भी है. लोककथाओं में इस भूखंड के नाम से जुड़ी कई मान्यताएं हैं. एक कथा के मुताबिक राजा त्रिपुर, जो ययाति वंश का 39 वाँ राजा था, उनके नाम पर ही इस राज्य का नाम त्रिपुरा पड़ा. वहीँ दुसरे मत के अनुसार स्थानीय देवी त्रिपुर सुन्दरी के नाम पर इसका नाम त्रिपुरा पड़ा. लेकिन एक कथा और है जो ज्यादा रोचक है.
     त्रिपुर नाम का एक राक्षस हुआ जिसने एक लाख वर्ष तक तपश्या की. उसके तपश्या से इन्द्रादि देवता भी भयभीत हो उठे. त्रिपुर के तपस्या को भंग करने के अनेको प्रयास विफल हो गए. ब्रह्मा जी स्वयं प्रकट होकर उससे वर मांगने को कहा. त्रिपुर ने मनुष्य या देवता के हाथों न मरे जाने का वरदान प्राप्त किया. कुछ समय बीतने पर देवताओं नें मंत्रणा कर कैलाश पर भगवन शिव के साथ त्रिपुर को युद्ध में लगा दिया. शिव ने भेष बदलकर कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुर राक्षस का वध कर दिया. गिरिजापति शिव यहीं त्रिपुरारी कहलाये. इस रात्रि देव दीपावली भी मनाया जाता है.
           महाभारत की कई कथा भी त्रिपुरा से जुड़ी हैं. ऐसी मान्यता है कि महाभारत के युद्ध में तत्कालीन त्रिपुरा नरेश कई हजार हाथी, घोड़े और सैनिकों के साथ कुरुक्षेत्र पहुंचे थे. महाभारत कालीन वह ध्वज आज भी राजमहल में सुरक्षित है.
               कालचक्र की गति के साथ इन कथाओं की सत्यता को भले ही झुठला दिया जाय, लेकिन लोक व्यव्हार उस समाज के वर्त्तमान मनोदशा को जानने का सबसे बेहतर तरीका होता है. वर्त्तमान त्रिपुरा की स्थापना 14वीं शताब्दी में 'माणिक्य' नामक इंडो-मंगोलियन आदिवासी मुखिया ने की थी, जिसने हिन्दू धर्म अपनाया था. त्रिपुरा के शासकों को मुग़लों के बार-बार आक्रमण का भी सामना करना पड़ा जिसमें आक्रमणकारियों को कम ही सफलता मिलती थी. कई लड़ाइयों में त्रिपुरा के शासकों ने बंगाल के सुल्‍तानों को हराया. 19वीं शताब्‍दी में 'महाराजा वीरचंद्र किशोर माणिक्‍य बहादुर' के शासनकाल में त्रिपुरा में नए युग का सूत्रपात हुआ. उन्‍होंने अपने प्रशासनिक ढांचे को ब्रिटिश भारत के नमूने पर बनाया और कई सुधार लागू किए. उनके उत्तराधिकारों ने 15 अक्‍तूबर, 1949 तक त्रिपुरा पर शासन किया. इसके बाद त्रिपुरा भारत संघ में शामिल हो गया. प्रारम्भ में यह भाग - सी के अंतर्गत आने वाला राज्‍य था और 1956 में राज्‍यों के पुनर्गठन के बाद यह केंद्रशासित प्रदेश बना. 1972 में इसने पूर्ण राज्‍य का दर्जा प्राप्‍त किया. केरल और पश्चिम बंगाल के सदृश त्रिपुरा में भी लम्बे अरसे से वामपंथी शासन है. प्रगतिशील विचार के समर्थकों के शासन काल में वास्तविक प्रगति की गति सिथिल पड़ चुकी है. ढांचागत बुनियादी संरचनाये अभी भी विकसित नहीं हुई है. उग्रवाद और नक्सलवाद चरम पर है.  
            गोवा तथा सिकिम्म के बाद त्रिपुरा देश का तीसरा सबसे छोटा राज्य है. कृषि, पर्यटन तथा कला जगत में विकास की अपार संभावनाएं राजनीतिक संकीर्णता की भेंट चढ़ जाती है. शिव और शक्ति के इस प्रदेश का कभी आप भी दीदार जरुर करिए.  

राजीव पाठक 
+91 9910607093 
                     


                          

बुधवार, 19 नवंबर 2014

स्वयं से प्रेरणा लेता हूँ : संतोष

संतोष कुमार राय कुछ ही दिनों बाद किसी एक जिला के सबसे बड़े अधिकारी होंगे. वर्ष 2013 के सिविल सर्विस परीक्षा में हिंदी माध्यम से प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले संतोष के मन में पहली बार आई.ए.एस. बनने का ख़याल जिस उम्र में आया, अमूमन वह उम्र खेलने-कूदने का होता है. बिहार के समस्तीपुर जिले के एक अत्यंत पिछड़े गांव में पले-बढ़े संतोष के बालक मन पर अपने बड़े-बूढ़ों से कलेक्टर साहब के बारे में सुनने पर यह लगता था कि वही सबसे बड़े अधिकारी होते हैं. वो चाहें तो सबकुछ ठीक हो सकता है. संतोष ने भी संकल्प लिया कि बनना है तो बस आई.ए.एस.

मुझसे सहज बातचीत करते हुए श्री संतोष राय ने बताया कि लगातार दस वर्ष तक उन्होंने रात-दिन एक ही सपना देखा जो आज साकार हो चुका है. संतोष ने एक ऐसे गावं से स्कूली शिक्षा प्राप्त की जहां आज भी शिक्षकों की कमी है. उस गावं में न तो पक्की सड़क है और न ही बिजली. गावं के लोग संतोष के उत्तीर्ण होने पर इस उम्मीद में हैं कि अब उनका भी दिन बदलेगा.

संतोष अभी ट्रेनिंग में हैं. अनुभव विस्तार के लिए कुछ दिनों के लिए उन्हें उत्तर प्रदेश के एक जिला अधिकारी के पास भेजा गया था. मसूरी लौटते समय जब हम दिल्ली में उनसे बातचीत कर रहे थे उस वक्त भी संतोष राय ने कुछ स्कूली बच्चों से अपने बीते दिनों के अनुभव को साझा किया. आई.ए.एस. बनने का तो मेरे बचपन का स्वप्न था; लेकिन, अब 30 साल की उम्र में ही मेरा सपना पूरा हो सका. मेरी कहानी किसी फिल्म की पटकथा से कम नहीं है. यहाँ सब कुछ है - सपने, संघर्ष, कदम-दर-कदम लक्ष्य का ओर बढ़ना, कुछ तीर निशाने पर; तो कभी मायूसी और अंत में वांछित लक्ष्यों को पाने का सुखद अनुभव.

मैं ग्रामीण पृष्ठभूमि से संबंध रखता हूँ और अपर्याप्त संसाधनों के कारण जीवन में सुख-आराम की चीज़ों एवं उन्मुक्त वातावरण से वंचित ज़रूर रहा था ; लेकिन, किसी के सामने कभी नीचा महसूस नहीं किया और न ही किसी से कम. सदैव इस विश्वास के साथ जिन्दगी में आगे बड़ा हूँ कि भगवान ने जो सभी दिया गया है वह मुझे भी दिया है; अगर, कुछ कमी है भी तो वह सब पाने के लिए कठिन प्रयास करूँगा.

हम में से हर एक की कुछ शक्तियों और कमजोरियों है; मेरी मजबूत इच्छा शक्ति ही मेरा सबल पक्ष है और मैंने अपनी क्षमताओं को कभी भी नजर अंदाज नहीं किया. मुझे लगा कि जब सिविल सेवा परीक्षा में पाठ्यक्रम का स्तर स्नातक स्तर के समकक्ष है तो मुझे सफलता की संभावना के बारे में बहुत ज्यादा चिंता नहीं करनी चाहिए. स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद, मैंने महसूस किया कि मैं यह कर सकता हूँ और इस विचार के साथ ही मैंने सिविल सेवा परीक्षा में शामिल होने के बारे में सोचा. मैंने हमेशा मानक पाठ्य-पुस्तकों में विश्वास रखा है और जो पढ़ा, सब समझने की कोशिश की न कि रटने में. मैंने सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी की शुरूआत इस आशा के साथ की, कि केवल उच्च प्रयास ही मुझे वांच्छित लक्ष्य तक पहुँचा सकता है. लेकिन, यह निर्णय इतना आसान नहीं था जितना मैं सोच रहा था; इस परीक्षा हेतु संसाधनों की कमी और इसके साथ जुड़ी अनिश्चितताओं ने मुझे इसके बारे में पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया. उस समय मैं असहाय था और कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण मुझे सिविल सेवा परीक्षा में शामिल होने की योजना को स्थगित करना पड़ा.

इसी बीच, 2007 में मेरी शादी हो गई और मेरी एक बेटी भी है अब 5 साल की हो गई है. मैंने अपने परिवार को पूरा समय दिया और बदले में, उनसे भी भरपूर प्यार, स्नेह और सबसे महत्वपूर्ण मानसिक शांति मिली जिस कारण एक बार फिर से मैं आगे की सोच रख पाया और अपनी नियती को पाने निकल पड़ा. किसी भी अन्य युवा की तरह, मेरा भी पहला उद्देश्य जीवन में स्थिरता की खोज रही और निरंतर प्रयासों के साथ इसमें मुझे सफलता भी मिली और 2010 में मैं एस.एस.सी. (स्नातक स्तर) परीक्षा में चुना गया और सौभाग्य से केंद्रीय सचिवालय, नई दिल्ली में पोस्टिंग मिल गयी. ईश्वर की कृपा से सरकारी सेवा और शादी के बाद मैं जीवन में व्यक्तिगत परिस्थितियाँ भविष्य के सुख का दरवाज़ा खोलती नजर आयीं.

कहते हैं कि जब कुछ अच्छा होना होता है तो लगभग सभी बातें एक के बाद एक सही घटनी शुरू हो जाती हैं. इसी क्रम में मेरी पत्नी में इस परीक्षा के प्रति अधिक झुकाव था और उन्हें लगा कि मैं यह कर सकता हूँ. सिविल सेवा परीक्षा में प्रयास करने के लिए उन्होंने मुझे निरंतर प्रोत्साहित किया जिस कारण मैं अपने कैरियर गंतव्य के बारे में गंभीर हो गया. दिल्ली, सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के लिए केंद्र रहा है, और यहाँ मुझे सब मिल गया जिसकी मुझे अपनी तैयारी की योजना के अनुरूप जरूरत थी. पुस्तकें, अध्ययन सामग्री, मार्गदर्शन, और सही सलाह – जिन सब ने मेरी सफलता में बहुत योगदान दिया है.

सिविल सेवा परीक्षा 2011 में पहले प्रयास में मैंने प्रारंभिक परीक्षा पास की लेकिन, आगे नहीं जा सका. सिविल सेवा परीक्षा 2012 में पिछले प्रयास में मुझे 665वाँ रैंक मिला और भारतीय राजस्व सेवा (आयकर) मिल गयी और अब, तीसरे प्रयास में, आई.ए.एस. का पद पाने की आशा से बड़ी राहत महसूस कर रहा हूँ.

मेरे एक प्रश्न के जबाव में कि आपका आदर्श कौन है ? संतोष ने कहा कि मैं स्वयं अपना आदर्श हूँ. आशावादी हूँ. कर्म को प्रधान मानता हूँ. इसीलिए सफल हुआ हूँ. 

राजीव पाठक
09910607093

सोमवार, 3 नवंबर 2014

यह महादलित वाली महाराजनीति का परिणाम है !

आज सुबह मेरे मेल बॉक्स में पहला ई मेल वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपई जी का था. अपने ब्लॉग के माध्यम से उन्होंने जिस विषय को उठाया है वह वाकई काफी गंभीर है. मेरा जन्म भी सीतामढी में हुआ है. बचपन से ही हमने भी मुसहर टोला को देखा सुना है. गावं का विकास हुआ है. बिजली, सड़क, चिकित्सा सुविधा में सुधार हुआ है. लेकिन मुसहर टोला आज भी वैसा ही है जैसा बीस वर्ष पहले था. इस सबके लिए कौन दोषी है ये बताना बड़ा मुश्किल है. इससे पहले कि इस मुद्दे की गहराई में उतरे. जिस पत्र नें मुझे विचलित किया जरा आप भी उसे पढ़ लीजिये.
(साभार : पुण्य प्रसून वाजपई)     

प्रणाम,
मैं दिलीप + अरुण दोनों भाई आपको अपने गॉंव - तेमहुआ , पोस्ट - हरिहरपुर, थाना - पुपरी, जिला - सीतामढ़ी, पिन - 843320 , राज्य - बिहार, आने का निमंत्रण देता हूँ, क्योकि मै आपको वहां ले जाना चाहता हूँ जहाँ की फिजा में 48 दलित मुसहर भाई - बहन की अकाल मृत्यु की सांसों से मेरा दम घुटता है। मैं आपको उन्हें दिखाना चाहता हूँ जो मरना तो चाहते है मगर अपने बच्चे, अपने परिवार के खातिर किसी तरह जी रहे हैं। मैं आपको उनसे मिलाना चाहता हुं जो जिन्दा रहना तो नहीं चाहते मगर जीवित रहने रहने के लिए मजबूर हैं| मैं आपको उस वादी में ले जाना चाहता हु जहाँ के लोग या तो भूखे हैं या फिर भोजन के नाम पर जो खा रहे हैं, उसका शुमार इंसानी भोजन में नहीं किया जा सकता हैं! मै आपको उन कब्रों तक ले जाना चाहता हूँ  जिसमे दफ़न हुए इंसानों के भटकते रूह इस मुल्क की सरकार से यह आरजू कर रही है, कि कृपया हमारे बच्चों के जिन्दा रहने का कोई उपाय कीजिये ।

मै आपको हकीकत की उस दहलीज़ पे ले जाना चाहता हु जहाँ से खड़ा होकर जब आप सामने के परिदृश्य को देखेंगे तो आपके आँखों के सामने नज़ारा उभर कर यह आएगा क़ि आज़ाद भारत में आज भी इंसान और कुत्ते एक साथ एक ही जूठे पत्तल पर अनाज के चंद दाने खा कर पेट की आग बुझाने को मज़बूर हैं। मै आपको उस बस्ती से रु-ब-रु करना चाहता हुं जो बस्ती हर पल हर क्षण हर घड़ी भारत के राष्ट्रपति से यह सवाल पूछ रही है कि बता हमारे बच्चे कालाजार बीमारी से क्यूँ मर गए? मै आपको उन बदनसीब इंसानों से मिलाना चाहता हु जो अपनी शिकायत या समस्या का हल ढूंढने में खुद को पाता है।

मै आपको यहाँ इसलिए बुलाना चाहता हूं क्योंकि पिछले 10 सालो में 3600 से अधिक पत्रों द्वारा की गई हमारी फरियाद उस पत्थर दिल्ली के आगे तुनक मिज़ाज़ शीशे की तरह टूट कर चूर - चूर हो जाती है । मैं आपको यह सब इसलिए कह रहा हुं क्योकि बचपन से लेकर आज तक मैं ऐसे लोगो से घिरा हुआ हुं जो अपनी जिंदगी की परछाइयों में मौत की तस्वीर तथा कब्रो के निशान देखते हैं। जो भोजन के आभाव में और काम की अधिकता के कारण मर रहे है ! जिनका जन्म ही अभाव में जीने और फिर मर जाने के लिए हुआ है। ये लोग इस सवाल का जवाब खोज रहे है कि मेरी जिंदगी की अँधेरी नगरी की सीमा का अंत कब होगा ? हम उजालों की नगरी की चौखट पर अपने कदम कब रखेंगे ? लिहाजा ऐसी निर्णायक घड़ी में आप हमारे आमंत्रण को ठुकराइए मत क्योंकि यह सवाल  केवल हमारे चिंतित होने या न होने का प्रश्न नहीं है । यह केवल हमारे मिलने या न मिलने का प्रश्न नहीं है। बल्कि यह हमारे गावं में कालाजार बीमारी से असमय मरने वाले नागरिक के जीवन मूल्यों का प्रश्न है। यह उन मरे हुए लोगों के अनाथ मासूमों का प्रश्न है! यह उन मरे हुए इंसानो के विधवाओं एवं विधुरो का प्रश्न है। यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र सरकार की संवैधानिक जिम्मेवारी का प्रश्न है! यह हमारे द्वारा भेजे गए उन हजारों चिठ्ठियों का प्रश्न है जिसमें हमने अपने गावं के गरीबों की जान बचाने की खातिर मुल्क के राष्ट्रपति से दया की भीख मांगी थी।

इसलिए देश और मानवता के हित में कृपया हमारा आमंत्रण स्वीकार करें!
धन्यवाद, दिलीप कुमार/अरुण कुमार/सीतामढ़ी (बिहार) [+919334405517]
इति.


दिलीप और अरुण के जख्म नए नहीं हैं. कहानी लम्बी है. लगभग दो दशक हो गए. एक चुनाव प्रचार में लालू यादव ने जब अपनी बनियान को कुर्ते के ऊपर पहनी तो सामान्यतया सबने यही समझा कि लालू ने लोगों को रिझाने-हँसाने का यह कोई नया तरीका अपनाया है. सभा को सम्बोधित करने जब लालू मंच पर पहुंचे तो उन्होंने उल्टे लोगों से ही पूछ डाला कि बताओ मैंने बनियान को ऊपर क्यों पहनी है ? कुछ देर तक नारे से माहौल को गरम होने देने के बाद लालू ने खुद उस प्रश्न का जवाब दिया. 'अब समय आ गइल बा... बड़का के नीचे कर औ छोटका सब ऊपर आब' . यह पहला मौका नहीं था जब लालू ने दलित और पिछड़ों को यह महसूस कराया था कि उसकी लड़ाई लड़ने वाला कोई और नहीं है .लालू जानते थे कि बिहार की राजनीति में बस एक सिक्का ऐसा है जिसे वो लम्बे समय तक चला सकते हैं. हिन्दू राजनीति की धारा से इतर कोई गणित ठीक बैठ पा रहा था तो वह लालू का एम वाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण था. 

एम वाई समीकरण को दोहरा मजबूती दे रहा था लालू का दलित-पिछड़ा वाला टॉनिक. लालू ने राजनीति और प्रशासन का एक नया मॉडल प्रस्तुत किया. मुझे अच्छी तरह याद है लालू के चरवाहा विद्यालय को नई सोच और विकास की राजनीति का नाम दिया गया था. तथाकथित दलित राजनीति के पैरोकार और  पंडितों ने इसे ऐतिहासिक कदम बताया था. उन्ही दिनों पटना के गांधी मैदान में 'महारैला' शब्द का भी जन्म हुआ. लाठी धारी हजारों लोगों को लालू ने युग परिवर्तन का दिवा स्वप्न दिखा दिया. रोजगार, भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य के वास्तविक कार्यों से दूर तत्कालीन बिहार सरकार जंगल राज की ओर जनता को धकेल चुकी थी. कुछ ही वर्षों बाद परिणाम सामने आने लगा.  
                        बिहार में अपहरण प्रमुख व्यापार बनकर उभरा. सामान्य विद्यालय भी चरवाहा विद्यालय की श्रेणी में आ गया. एम.सी.सी. (माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर) का जाल फ़ैल गया. लेकिन प्रकृति के नियम को कौन झुठला सकता है. हर क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया होती है. एम.सी.सी. के खिलाफ सवर्णों की रणवीर सेना संगठित हो गई. जातिगत तनाव चरम पर था. युवाओं का पलायन सर्वाधिक हो गया. बिहार और बिहारी सम्मान को देश-दुनिया में ठेश पहुंची. भ्रष्टाचार और घोटाला सरकारी कार्यालय के कार्यप्रणाली का सामान्य हिस्सा बन गया.
                             देर से ही सही, जनता ने जंगल राज को नकार दिया. एक शिक्षित और विकास की दृष्टि लिए सुलझे हुए व्यक्ति नीतीश कुमार को बिहार का कमान मिली. इसमें कोई दो राय नहीं कि बिहार के विकास की रफ़्तार फिर से तेज़ हो गई. अपहरण की घटनाओं में काफी कमी आ गई. मूलभूत सुविधाओं का विकास हुआ. जनता खुद को सुरक्षित महसूस करने लगी. लेकिन राजनीति में जीत ही अंतिम सत्य है. नीतीश कुमार को जब दूसरी बार सत्ता में आने के लिए अपनी रणनीति बनानी पड़ी तो उन्होंने भी लालू के दलित कार्ड को मात देने के लिए एक नए कार्ड का इस्तेमाल किया. देश के राजनितिक-सामाजिक शब्दावली में शायद पहली बार महादलित शब्द का प्रयोग हुआ. कुछ मायनों में महादलित शब्द जिस जाति विशेष के लिए प्रयोग हुआ वह उचित ही था. लेकिन नामाकरण कर देने से उनके समस्या का समाधान कतई नहीं होने वाला है, यह नीतीश कुमार भी भलीभांति जानते थे. हर मुशहर टोले में एक रेडियो दिया गया. महादलित के बच्चों के लिए अलग विद्यालय और युवाओं के लिए विशेष आरक्षण. 
                संयोग से आज बिहार के मुख्यमंत्री उसी महादलित जाति से आते हैं. पद भार सँभालने के बाद जीतन राम मांझी स्वयं कितनी बार मुसहर टोले में गए हैं? महादलितों को विकास की मुख्यधारा में लेने के लिए उन्होंने कौन सी दूरदर्शी योजना बनाई है ? यह बड़ा सवाल है. हाँ ! उन्होंने महादलित को जनसँख्या बढ़ाने की सलाह सार्वजनिक मंच से जरूर दी है. महादलित का मुख्यमंत्री होना महादलित के लिए वरदान होगा या अभिशाप यह तो भविष्य तय करेगा.
 
पुनः प्रसून जी के ब्लॉग से ही साभार कुछ पंक्तियों के साथ विराम लेता हूँ. दिनकर की कविता, “भारत का यह रेशमी नगर “की दो पंक्तिया दिल्ली को सावधान और सचेत तो जरुर करेगी, “तो होश करो, दिल्ली के देवो, होश करो / सब दिन को यह मोहिनी न चलने वाली है / होती जाती है गर्म दिशाओं की सांसे, / मिट्टी फिर कोई आग उगलने वाली है। 

राजीव पाठक 
+919910607093 

रविवार, 2 नवंबर 2014

लौह पुरुष को याद रखा, लौह स्त्री को क्यों भुला दिया ?

यह सत्य है कि राजनीति जब विचारधारा की गलियों से होकर सत्ता तक पहुंचती है तो स्वाभाविक संकुचित हो जाती है, और सत्य यह भी है कि विचारधारा के बिना लोकतान्त्रिक ढांचे में जनता से न तो आपका संवाद स्थापित हो सकता है, और न ही आप जनता का समर्थन प्राप्त कर सकते हैं. क्योंकि जनता उन्ही गलियों में रहती है जहाँ से होकर आप सत्ता तक पहुँचते हैं. सत्ता परिवर्तन के साथ ही विचारधारा के अनुरूप बाकी चीजें बदलनी लाजमी हैं. लेकिन विचारधारा और सत्ता की राजनीति से ऊपर भी कुछ है ! भारत में ही इसके दर्जनों उदाहरण हैं.

श्रीमती इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री हुआ करती थीं और अटल बिहारी वाजपेयी विपक्ष के एक नेता. भारत के शीर्ष नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल यूरोप के दौरे पर था. पत्रकार वार्ता में एक पत्रकार ने अटल जी से यह सवाल किया कि आपके देश में सबसे मजबूत नेता कौन है? इस प्रश्न के उत्तर में अटल जी ने भारत के कई समकालीन नेताओं के नाम बता दिए. पत्रकार यह समझते हुए कि अटल जी देश में विपक्ष के नेता हैं इसीलिए इंदिरा गांधी का नाम नहीं बताया है, एक और प्रश्न किया. क्या श्रीमती गांधी आपके देश की बड़ी नेता नहीं हैं ? अटल जी ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, आपने तो भारत के बड़े नेताओं का नाम पूछा था, श्रीमती गांधी तो दुनिया के बड़े नेताओं में आती हैं. उत्तर सुनकर सभी भौंचक्के रह गए. यह राजनीतिक उदारता का परिचय था.

1965 के भारत-चीन युद्ध के समय ऐसी ही उदारता पंडित नेहरू ने दिखलाई थी. विचारधारा के अनुसार कांग्रेस के विपरीत दूसरे ध्रुव पर खड़े राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों को नेहरू ने गणतंत्रता दिवस परेड में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित किया. संघ के स्वयंसेवक पहली बार सेना के साथ राजपथ पर कदमताल करते नजर आये. उसी समय सरकार के कहने पर संघ के स्वयंसेवकों ने दिल्ली की यातायात व्यवस्था को भी संभाला था.

भारत की लोकतान्त्रिक यात्रा में ऐसे अनेक उदाहरण है जिनमे विचारधारा और राजनीति से ऊपर उठकर देशहित के लिए निर्णय लिये गये. व्यक्ति से ऊपर पद की गरिमा को रखा गया. लेकिन पिछले एक दशक में देश की राजनीति बदली है. विचारधारा की धार पैनी होती गई है परिणामतः राजनीतिक संकीर्णता अब चरम पर है.

हमारे प्रधानमंत्री जिन जुमलों पर जनता को लुभाते हैं ज़रा उसपर भी गौर कीजिए. एक तरफ "एक भारत- श्रेष्ठ भारत" और दूसरी तरफ "कांग्रेस मुक्त भारत". नरेंद्र मोदी यह जानते हैं कि कांग्रेस मुक्त भारत दिवा स्वप्न जैसा है, लेकिन जनता की ताली और समर्थन बटोरने के लिए यह नुस्खा अब आजमाया हुआ है. इसलिए इसका ज्यादा प्रयोग हो रहा है. कहते हैं कि राजनीति, रणभूमि और प्यार में सब कुछ जायज़ होता है, बशर्ते कि आप सफल हो जाएँ. शायद मोदी इसी तर्ज पर चल रहे हैं.

मोदी यह बखूबी जानते हैं कि दुनिया में भारत का प्रतिनिधित्व करना है तो गांधी का सहारा जरुरी है और देश की राष्ट्रवादी जनता को मोहित करना है तो "एक भारत- श्रेष्ठ भारत" की मिसाल पटेल को एक आदर्श के रूप में स्थापित करना होगा. गांधी और पटेल अभी तक कांग्रेस के खाते में आते थे, लेकिन मोदी ने बेहद तरीके से उन्हें सर्वस्पर्शी बना दिया. यह अच्छी बात है.

सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती वाले दिन ही स्वर्गीय इंदिरा गांधी की पुण्य तिथि भी होती है. मोदी जी या उनके सूचना प्रसारण मंत्रालय द्वारा श्रद्धांजलि के एक भी विज्ञापन या फेसबुक, ट्विटर से दिखावे का ही सही, एक भी सन्देश क्यों नहीं दिया गया ? यह सवाल राजनीतिक संकीर्णता पर है. इंदिरा गांधी भी सिर्फ कांग्रेस की नहीं हैं, जैसे पटेल और गांधी ! कभी अटल जी ने श्रीमती गांधी को लौह स्त्री की संज्ञा दी थी. फिर सवाल यह है कि सरकार ने लौह पुरुष को याद रखा, लौह स्त्री को क्यों भुला दिया ?

गुरुवार, 30 अक्टूबर 2014

छठ पूजा की आस्था : सियांग से यमुना तक

                                             कई वर्षों बाद मैं भी इस बार छठ पूजा पर दिल्ली में हीं हूँ. दिल्ली के नज़ारे बहुत कुछ बदल गए है. फेसबुक पर ट्रेंड में छठ सबसे ऊपर चल रहा है. दिल्ली के उपराज्यपाल ने छठ पर एक दिवसीय अवकास की औपचारिक घोषणा की है. प्रधानमंत्री नें देशवासियों को छठ पूजा की शुभकामना दी है. दिल्ली के गली-मुहल्लों में छठ की शुभकामना सहित पोस्टर और होर्डिंग लगे हुए हैं. मुझे मेरे कई मित्रों ने छठ की बधाई दी है. इस सबमें काफी कुछ नया है. काफी कुछ बदला है बीते कुछ वर्षों में.         
                    
                                             
पिछले कुछ वर्षों में मैं भारत के विभिन्न स्थानों पर घूमता रहा हूँ. देश के अलग-अलग राज्यों में आस्था के अनेक रूप हैं. पर्व-त्यौहार, विवाह, जन्म-मरण को मनाने के भिन्न-भिन्न तरीके उस स्थान, जनजाति या समाज को अलग पहचान देते हैं. लेकिन जब किसी खास स्थान का कोई त्यौहार वहां से हजारों मील दूर मनाया जाता है, तो उसे एक नई पहचान मिलती है. जी हाँ ! मैं छठ पूजा की बात कर रहा हूँ. गत चार वर्षों में मुझे जिन चार स्थानों पर छठ देखने का मौका मिला, वह आज भी मेरे स्मृति पटल पर अंकित है |
       
                       शायद आपकी कल्पना से परे हो वह स्थान. अक्टूबर के महीने में कड़ाके की ठंढ, कपकपाती हवा.कमर तक पानी में छठ के व्रती उगते हुए सूर्य की प्रतीक्षा कर रहे थे. यह अरुणाचल प्रदेश में बहने वाली सियांग नदी की तस्वीर है. यही नदी असम में ब्रह्मपुत्र के नाम से जानी जाती है. स्थानीय निवासी शुरू में हैरान होते थे, कि इस प्रकार कि कठिन पूजा पद्धति का भला क्या औचित्य है. लेकिन आज छठ पूजा की तैयारी में स्थानीय जनजातीय समाज भी अपना सहयोग करता है. उन्हें अब लगता है कि आस्था में प्रश्न का कोई स्थान नहीं होता. और एक अच्छी बात यह भी है कि छठ पूजा के बहाने बारिश के मौसम के बाद यह पहला मौका होता है जब सामूहिक प्रयास से नदी तट की अच्छी सफाई हो जाती है.भारत में सूर्योदय का यह स्थान इस महान आस्था को संवर्धित करता है. कोई जातीय या सामाजिक विभेद नहीं है. बल्कि अरुणाचल प्रदेश के आदी,गालो और आपातानी जनजाति इस बात से प्रसन्न रहते हैं कि उनके भी आराध्या देव सूर्य ही तो हैं. स्थानीय शब्द डोनी-पोलो सूर्य और चन्द्रमा के लिय ही प्रयुक्त होता है.आस्था का केंद्र एक ही है, उसकी पूजा पद्धति और नाम अलग हो सकते है यह फिर से यहाँ सत्य साबित होता है.

                                    पूरब का का नद ब्रह्मपुत्र भी छठ के सूर्य अर्घ्य का साक्षी बनता है, माजुली से लेकर गुवाहाटी के पलटन बाजार घाट तक हजारों की संख्या में श्रद्धालु सूर्य षष्ठी को अस्ताचलगामी सूर्य और सप्तमी को उदयमान सूर्य को जल,दूध, गन्ना, नारियल सहित विशेष पकवान ठेकुआ का अर्घ्य देते हैं. छठ के परंपरागत गीत के साथ अब कुछ नयी धुन भी सुनाई देने लगी है. आप हैरान न हों अब छठ का गीत असमिया भाषा में भी गाया गुनगुनाया जाता है. 
                                        
                                              असम से बंगाल होते हुए यह आस्था धारा गंगासागर तट तक दिखती हैं. इधर गंगा और उसकी सहायक नदियों का किनारा भी छठ पूजा के प्रसाद और फल-फूल के सुगंध से दिव्य हो उठता हैं. गीत के स्वर सुनाई देते हैं. घोड़वा चढ़ल आवे..." गीत सुनते हुए नज़ारे को देखते हुए मेरे ध्यान में आया कि राजनीति हर घोड़े पर सवार हो जाती है. नेताओं का आस्वासन, आशीर्वाद मांगने का अंदाज और अपनापन दिखाने की कला छठ के मौके पर भी सर्वत्र दिख जाती है. हाँ तो राजनीति से पटना की याद आ गई. यह निर्धारित तो नहीं है लेकिन आस्था के केंद्र की बात की जाय तो बिहार ही छठ पूजा का प्रमुख राज्य है. महीना भर पहले से दीवाली के साथ-साथ छठ की भी तैयारियां शुरू हो जाती है. बांस की नई टोकरी, पीतल या मिट्टी का कलश और चालीस प्रकार के प्रसाद का भोग भगवान दिनकर को अर्पित किया जाता है. छठ के दिनों में देश-विदेश में कमाने गए अपनों के घर आने का इंतजार हर देहरी और हर माँ को होता है. जमाना बदल गया है लेकिन भावना नहीं बदलती, आस्था और विश्वास में कोई बदलाव नहीं होता. शायद यही कारण है कि, अमेरिका में जा बसे लोग भी कोशिश करते हैं कि छठ के खरना का खीर और परना का प्रसाद अपने माँ के हाथों ही मिले.
           
                                    एक दशक के भीतर हीं दिल्ली में छठ पूजा के प्रति लोगों में जानकारी बढ़ी है.छठ के बहाने राजनीति करने वाले यह बखूबी समझते हैं कि,दिल्ली की राजनीति में आने वाले समय में यह संख्याबल काफी महत्वपूर्ण होने वाला है. दिल्ली में रहने वाले पूर्वी उत्तरप्रदेश और बिहार के लोगों की संख्या लगभग चालीस प्रतिशत बताई जाती है. इनमें से अनेक लोगों नें यहीं घर बना लिया है या स्थाई रूप से रहने लगे हैं. लेकिन हजारों की संख्या में निम्न मध्यम वर्ग के मजदूर, कर्मचारी आज भी पर्व-त्यौहार अपने घरवालों के साथ ही मनाना चाहते हैं. सप्ताह भर पूर्व से प्रतिदिन दर्जनों विशेष ट्रेने होने के बावजूद भी भीड़ में कमी नहीं होती. कई लोग जा भी नहीं पाते हैं. जान है तो जहान है .मैं भी छठ के इस विस्तार होते स्वरूप का प्रत्यक्षदर्शी बन रहा हूँ.दिल्ली में कई पंजाबी और राजस्थानी परिवारों ने भी छठ पूजा प्रारम्भ कर दिया है. लोग बताते हैं कि उनके लिए किसी छठ व्रती ने मन्नत मांगी, जो पूरी हो गई तो इन्होने भी व्रत रखना शुरू कर दिया. अब कसार और ठेकुआ यहाँ भी मिलेगा,पके केले की सुगंध और गन्ना चूसने का आनंद भी.
                      
                                          यह आस्था है. इसे जबरन फ़ैलाने की आवश्यकता नहीं होती, आपके व्यव्हार से दूसरों के ह्रदय तक यह स्वतः उतर जाता है. इस प्रार्थना के साथ कि सूर्य हम सबको निरोगी काया और तेज प्रदान करें, मेरा भी दीनानाथ को प्रणाम.        

शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

मणिपुर में भी नए कानून की मांग !

राष्ट्रीय मीडिआ से गायब रहने वाले पूर्वोत्तर की सुर्ख़ियों से एक गंभीर समाचार मिल रहा है | मणिपुर में पिछले महीने भर से सरकार और स्थानीय संगठनों के बीच तना-तनी जारी है । 

इस बार मुद्दा इनर लाइन परमिट (Inner Line Permit) का है । पूर्वोत्तर के तीन अन्य राज्य अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और नागालैंड में पहले से ही इनर लाइन परमिट लागू है । अभी पहले से लागू राज्यों में यह व्यवस्था हटाने की चर्चा शुरू ही हो रही थी, कि मणिपुर में इसे लागु करने के लिए राज्य सरकार पर दवाब बनाया जा रहा है ।
इनर लाइन परमिट वीजा के जैसा ही है । यदि आपको मिजोरम जाना है और आप मिजोरम के नागरिक नहीं हैं तो आपको दिल्ली स्थित मिजोरम हाउस या गुवाहाटी के मिजोरम हाउस में आवेदन देना होगा कि आप कितने दिनों के लिए और किस कारण से मिजोरम जा रहें हैं । जितने अवधि के लिए आपको पास मिला है उससे पूर्व आपको वहां से वापस लौटना होगा । लेकिन आपको यह जानकर आश्चर्य होगा, कि यह नियम सिर्फ भारत के नागरिकों पर लागू होता है । यदि कोई विदेशी पर्यटक इन राज्यों में घूमने, पढ़ने या व्यापर करने के लिए आता है तो उसे इस प्रकार के किसी पास की जरुरत नहीं होती ।
यह व्यवस्था हाल-फ़िलहाल में नहीं बनी है । अंग्रेज के जमाने में योजना पूर्वक भारत के अन्य भागों से पूर्वोत्तर को अलग रखने के लिए कुछ नियम बनाये गए जिसको आधार मानकर यह कानून लागू किया गया ।
इस नियम का नुकसान भारत के एकता-अखंडता को है । इसका फायदा उन लोगों को है, जिसकी मनसा भारत में धर्मान्तरण, उग्रवाद और अराजकता का वातावरण बनाना है ।
मणिपुर में चल रहे आंदोलन के पीछे भी उग्रवादी संगठनों का हाथ है । समय रहते इसकी गंभीरता को समझना चाहिए नहीं तो केंद्र सरकार की पूर्वोत्तर को लेकर चिंता सिर्फ चिंता बनकर ही रह जाएगी |

-राजीव पाठक

+919910607093


इनर लाइन परमिट के बारे में विशेष जानकारी यहां उपलब्ध है -
http://en.wikipedia.org/wiki/Inner_Line_Permit

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

"इस्लाम और हिंदुस्तान"

सैकड़ों अनुसंधानकर्ताओं ने इस तथ्य की पुष्टि की है कि हजरत ईसा के जिंदगी के कई साल भारत में गुजरे थे। इनमें से कुछ उदा0 है- जीसस के भारत में रहने का प्रथम वर्णन 1894 में रुसी निकोलस लातोविच ने किया है। वो 40 बर्षों तक भारत आौर तिब्बत में भटकते रहे, इस दौरान उन्होनें पाली भाषा सीखी और अपने शोध के आधार पर एक किताब लिखी जिसका नाम है ‘दी अननोन लाइफ ऑफ जीसस क्राइस्ट‘ जिसमें उसने ये प्रमाणित किया कि ईसा ने अपने गुमनाम दिन लद्दाख और कश्मीर में बिताये थे। इतना ही नहीं अपने शोध में उन्होंने यह भी लिखा कि उन्होंनें उड़ीसा के जगन्नाथपुरी में जाकर भारतीय भाषायें सीखी और मनुस्मृति, वेद और उपनिषदों का अपनी भाषा में अनुवाद भी किया। लातोविच के बाद रामकृष्ण परमहंस के शिष्य स्वामी अभेदानंद ने 1922 में लद्दाख के होमिज मिनिस्ट्री का भ्रमण किया और उन साक्ष्यों का अवलोकन किया जिससें हजरत ईसा के भारत आने का वर्णन मिलता है और इन शास्त्रों के अवलोकन के पश्चात् उन्होंने ईसा के भारत आगमन की पुष्टि की और बाद में अपने इस खोज को बांग्ला भाषा में प्रकाशित करवाया। एक ईसाई विद्वान लुईस जेकोलियत भी ईसा के भारत आने की पुष्टि करते थे, 1869 में उन्होनें जीसस को श्रीकृष्ण का अवतार बताते हुये एक किताब भी लिखी। यही नहीं 1908 में ‘लेवी एच0 डाव्लिंग ने भी अपने खोज में यही पाया कि जीजस के जीवन के वो भाग जिसका विवरण बाईबिल में नहीं है निःसंदेह भारत में बिताए गये थे। ईसा के गुमनाम जीवन पर अध्ययन करने वाले जर्मन धर्मशास्त्री राबर्ट क्लाईट के मुताबिक बाईबिल के न्यू टेस्टामेंट में ईसा के 13 वें बर्ष से 30 वें बर्ष के जीवन का कोई वर्णन नहीं मिलता इसका कारण ये है कि अपने जीवन की ये अवधि उन्होनें भारत में बिताए और इस दौरान यहां उन्होनें वेद, उपनिषदों और बौद्धधर्मशास्त्रों का अध्ययन किया तथा फिर 30वें बर्ष में भारत लौट आये। वहां लौटकर उन्होनें उन्हीं शिक्षाओं का प्रचार किया जिसका उन्होंने भारत में अध्ययन किया था। 10 वीं सदी के प्रसिद्ध इतिहासकार शैक अल सईद अल सादिक ने अपनी किताब इमकालुद्दीन में उल्लेख किया है कि ईसा ने दो बार भारत की यात्रा की । बाद में मैक्समूलर ने इस ग्रंथ का जर्मन भाषा में अनुवाद किया। कश्मीर के प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर फिदा हुसैन ने ‘ फिफ्थ गास्पेल‘ (पंचम सुसमाचार) नामक अपनी किताब में यही प्रमाणित किया है कि ईसा भारत आये थे और तिब्बत तथा कश्मीर में बौद्ध रीति से कठोर साधनायें की थी। अमेरिकी ईसाई विद्वाव लेवी ने अपनी पुस्तक ‘द एक्वेरियन गास्पेल‘ में ये वर्णित किया है कि ईसा भारत आये थे और बनारस में भारतीय विद्वानों के साथ समय बिताया था। 1925 में निकोलस रोरिर ने भी निकोलस लातोविच के दावों की पुष्टि करने के लिये लद्दाख के होमिज मिनिस्ट्री का भ्रमण किया और पाया कि लातोविच के दावे सत्य थे। अपने अनुभवों को उन्होनेें ‘द हार्ट आॅफ एशिया‘ नामक किताब में कलमबद्ध किया। एक अन्य अमेरिकी विद्वान स्पेंसर ने भी ईसा के गुमनाम जीवन के बारे में यही माना है कि इस अवधि में वो भारत में रहे और साधनायें की। अहमदिया मत के संस्थापक ने भी इस बिषय पर विस्तृत शोध किया है और ये प्रमाणित किया है कि सूलीकरण के बाद ईसा अपनी माँ के साथ भारत आ गये थे और बाद की जिंदगी यही बिताई थी। आज भी कश्मीर के श्रीनगर में रौजाबल नाम से एक मजार है जिसके बारे में ये मान्यता है कि यह हजरत ईसा का कब्र है। लोनली प्लैनेट नामक पत्रिका में इस मजार के बारे में छपने पर यह चर्चा में आया। कश्मीरी विद्वानों ने तो यह भी दावा किया है कि 80 ईसा में कश्मीर में हुये बौद्ध संगीति में ईसा ने भी हिस्सा लिया था। आाधुनिक काल के कई विद्वानों ने भी अपने शोधों में इसकी पुष्टि की है। फिदा हसनैन और देहन लैबी ने अपने किताब में यही लिखा है। हिंदुओं के नाथ संप्रदाय के संन्यासी ईसा को अपना गुरुभाई मानते है क्योंकि उनकी ये मान्यता है ईसा जब भारत आये थे तो उन्होंनें महाचेतना नाथ से नाथ संप्रदाय में दीक्षा ली थी और जब उन्हें सूली पर से उतारा गया था तो उन्होंनें समाधिबल से खुद को इस तरह कर लिया था कि रोमन सैनिकों ने उन्हें मृृत समझ लिया। नाथ संप्रदाय वाले यह भी मानतें हैं कि कश्मीर के पहलगाम में ईसा ने समाधि ली। जर्मन विद्वान होल्गर कर्सटन ने ‘जीसस लीव्ड इन इंडिया नामक किताब में यही बातें लिखी। यह किताब ईसाई जगत की बेस्ट सेलर किताबों में शुमार है और इसने ईसाई जगत में तहलका मचा दी। ये बात सच है कि पवित्र कुरान या हदीस में इस बारे में कुछ स्पष्ट नहीं है पर ये भी सत्य है कि इन ग्रंथों में ईसा के भारत आगमन के विपक्ष में भी कुछ नही है। अलबत्ता कुरान के सूरह मोमिनून की 50 वीं आयत इसका हल्का सा इशारा करती है कि ईसा के जीवन के दिन भारत में गुजरे थे। आयत के शब्द हैं- ‘‘और मरयम के बेटे तथा उसके माता को हमने एक निशानी बनाया तथा उनदोनों को एक ऊँची जगह पर रखा जहाँ ठहराव था और बहता हुआ जलस्तोत्र। ईसा मसीह का जहाँ जन्म हुआ था वह इलाका धरती के सबसे निचले स्थानों में शुमार होता है तो निःसंदेह यह इशारा कश्मीर या लद्दाख के बारे में था जो धरती के सबसे ऊंची जगहों में शुमार किये जातें हैं।

अभिजीत सिंह 



मंगलवार, 2 जुलाई 2013

दो चश्में से देखिये : रान्झाना

"राँझना" पर दर्जनों रिव्यू पढ़ने के बाद आख़िरकार हम भी फिल्म देखने को विवश हुए । इंटरवल के पहले तक हाल में गूंजते सीटी से लगा की पी.वी.आर साकेत में आज बनारस के ही सारे लौंडे भड़े हैं । लेकिन ऐसा था नहीं ! जनता को फिल्म से इंटरटेन्मेंट चाहिए, सो उसे मिल रहा था । इंटरवल के कुछ ही मिनट बाद सीटी खामोसी में तब्दील हुई जो अंत में दर्शकों को न बोलने दे रही थी और न ही चुप रहने ! इश्क के चश्में से देख रहे दर्शक उदाश थे । जोया ने कुंदन के साथ अच्छा नहीं किया ! एक चश्मा राजनीति का है जिससे देखने पर यह सब जायज दिखता है । बनारसी स्टायल वाला कुंदन का दोस्त मुरारी अपनी बेबाक जुबान से दर्शकों की ताली बटोर ले गया ।ज़ोया के सोलह थप्पड़ खाकर भी कुंदन उसके प्यार के नींद में नए ख्वाब बुनता रहा । उधर ज़ोया को बनारस से अलीगढ आये अब चार साल हो गया । अब वो बारहवीं कर चुकी है । अगली मंजिल दिल्ली में जे.एन.यू.। ज़ोया को उसके तरफ से पहला प्यार यहीं जे.एन.यू. में हुआ । जसजीत सिंह शेरगिल जे.एन यू. ही नहीं भविष्य में देश का नेता होने वाला है और ज़ोया उसकी बेगम । प्रेसिडेंट बन गया जसजीत जे.एन यू. का । ज़ोया अब उसके साथ राजनीति में भी रूचि लेने लगी । कहानी का अगला अध्याय ऐसा कि कुंदन की जिंदगी, दिल्ली की राजनीति और ज़ोया जसजीत का प्यार सब बदल गया ।कहानी बनारस से शुरू होकर पुनः बनारस में ही ख़तम होने वाली है । विधाता का विधान ऐसा कि जोय और कुंदन कि शादी एक ही दिन सुनिश्चित हुई लेकिन एक दुसरे से नहीं । हल्दी लगी ,घर सजाये गए, मेहमान आ गए, लेकिन जन्म,मृत्यु और विवाह तो विधाता ही तय करता है कि कब और कहाँ होगा । शादी से पहले ही ज़ोया की चालाकी पकड़ी गई । अकरम हिन्दू है ! कुंदन-ज़ोया के कबाबी प्यार में कुंदन का हिन्दू होना ही तो हड्डी बन गया । लेकिन कमबख्त दिल तो दिल है, इसबार भी वहीँ अटका ! सबको पता चल गया । अकरम बने जे.एन.यू. के सुधारवादी नेता जसजीत को उनके किसी सिद्धांत की सुरक्षा न मिल सकी । उधर कुन्दन ने ज़ोया को जसजीत के घर पहुचने की ठान ली । कुन्दन और ज़ोया जसजीत के घर तो पहुंचे लेकिन जसजीत दुनिया त्याग चुका था । ज़ोया भी जे.एन.यू. में रहते हुए राजनीति की चाल चलना सीख गई थी । लेकिन ज़ोया का "रान्झाना" कुंदन का नसीब भी उसे जे.एन.यू. में घसीट लाया । अब असली राजीनीति शुरू हुई । ज़ोया जसजीत के सपनों को पूरा करने में लगी, लेकिन चाय वाले कुंदन का संवाद और तर्क उसे नेता बना दिया । ज़ोया को यह रास नहीं आया और न हीं सत्तारूढ़ दल के मुख्यमंत्री को । ज़ोया अब राजनीति के लिए फिर से कुंदन को स्नेह जाल में फसा चुकी थी । कुंदन आज जनता को संबोधित करने वाला था । लेकिन यह संभव न हो सका । ज़ोया ने कुंदन के मरने के बाद ही सही, मिडिया के सामने मुख्यमंत्री की नकाब उतार डाली । फिल्म तो यहीं तक । लेकिन फिल्म के अन्दर की राजनीति अभी समझना बांकी है रान्झाना की पटकथा सुगठित और सुन्दर है लेकिन मूल कहानी में सेकुलर डफली बजाने के लिए जे.एन.यू. की पूरी स्टोरी घुसाई गई लगती है । आनंद एल राय कहीं न कहीं अरविन्द गौड़ से भी कुछ प्रभावित लगते हैं । अरविन्द गौड़ और उनकी स्मिता थियेटर ग्रुप के कलाकारों का इस फिल्म में जैसा चरित्र दिखाया गया है वह उनके वास्तविक जीवन का चित्रण ही लगता है । ज़ोया ने छोटे शहरों से महानगरों में आ रहे युवाओं का चरित्र चित्रण चुपके से सबके सामने रख दिया है । फिल्म अच्छी है । नहीं देखें तो देखियेगा ज़रूर लेकिन दो चश्मों के साथ इश्क और राजनीति दोनों का चश्मा । अंक 4/5

राजीव पाठक 
+919910607093

गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

न्यू मीडिया : औजार या हथियार

न्यू मीडिया या मीडिया भारत के गाँव के लिए अभी भी एक नई कहानी से ज्यादा और कुछ नहीं है । आज भी मीडिया से ताल्लुकात रखने वाले लोग इसके किताबी और व्यावहारिक गुत्थियों में उलझ्तें हैं । लेकिन भारत का बहुत बड़ा तबका यानि ग्रामीण हिस्सा एक ऐसे मोड़ पर आकर खड़ा है जहाँ से न्यू मिडिया का द्वार खुलता जा रहा है लेकिन परंपरागत मिडिया के वजूद को भी वह तलाश रहा है ।
बीसवीं शताब्दी में जनसंचार को नया परिचय मिला । संवदिया के मर्मस्पर्शी शब्दों का सहारा कबूतर के माध्यम से भेजे जाने वाला ख़त बना और जल्द ही एक नया दौर आया जिसमें रेडिओ,पत्र पत्रिका, टेलीविजन न सिर्फ मनोरंजन और ज्ञानवर्धन का साधन बना बल्कि इसने भारत के जनसंचार के ढांचे को खड़ा किया , आजादी का ताना-बाना जिन माध्यमों से तैयार हुआ उसमें तत्कालीन प्रिंट मिडिया का काफी महत्वपूर्ण भूमिका रहा ।
आजादी के सात दशकों में भारत के हर क्षेत्र में बदलाव हुआ । देश का नया संविधान बना,विधायिका,कार्यपालिका और न्यायपालिका के बाद एक और खम्भा लोकतंत्र के मजबूती का आधार बना, मिडिया लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ बना । भारत का लोकतंत्र व्यस्क होता गया और साथ-साथ मजबूत होता गया उसका स्तम्भ भी । एक ऐसा दौड़ आया जब भारतीय लोकतंत्र के साथ मिडिया भी खतरे में पड़ी । वह दौड़ आपातकाल का था । आपातकाल कई मायनो में भारतीय लोकतंत्र के लिए वरदान भी साबित हुआ । जिस प्रकार भारतीय राजनीति में एक दल के वर्चस्व का दौड़ आपातकाल के साथ ही समाप्त हो गया, वैसे ही मिडिया भी एक नए कलेवर में सामने आया ।
राष्ट्रीय गतिविधि के साथ-साथ वश्वीकरण के प्रभाव से भी भारत अछूता नहीं रहा । बीसवीं शताब्दी का अंतिम दसक भारत में संचार क्रांति का काल बना । कंप्यूटर से भारत को दुनिया से जोड़ दिया । देखते ही देखते संचार के क्षेत्र में भारत अव्वल स्थान प्राप्त कर लिया ।
आज इक्कीसवीं सदी का भारत दुनिया के अध्त्तन संचार तकनीकों से युक्त है । दुनिया का सबसे ज्यादा मोबाईल उपभोक्ता भारत में है । भारत के ग्रामीण अंचलों को तेजी से इंटरनेट से जोड़ा जा रहा है । इस क्रांति का मसाल न्यू मिडिया है । न्यू मिडिया का दायरा सिमित नहीं है । ब्लॉग से लेकर न्यूज पोर्टल तक और फेसबुक से लेकर गूगल हैंग आउट तक सब न्यू मिडिया का ही स्वरुप है ।
 भारत के किसी गाँव से अमेरिका के किसी गाँव को जोड़ने का कम इसी सोशल नेटवर्किंग के द्वारा संभव हुआ है जिसे हम न्यू मीडिया के नाम से जानते हैं । न्यू मीडिया ने हमें सिर्फ आपस में जुड़ने का सुविधा मात्र नहीं दिया, बल्कि व्यापार ,राजनीति, संस्कृति और न जाने अनजाने में दुनिया को अपने गाँव तक लाने का साधन बना । न्यू मीडिया अभी अपने विकास के यौवन पर है इसलिए बुराइयों का साथ आना तो लाजमी है ही । देखने की बात यह है की संचार के हजारो वर्ष पुराने इतिहास में न्यू मीडिया की भूमिका निर्माण की होती है या विध्वंस की ।

राजीव पाठक 
+919910607093

शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

तुम मेरा पीठ खुजाओ, मैं तेरा पीठ खुजाता हूँ !

आपके जीवन में भी एक ऐसा क्षण जरुर आया होगा जब आपके पीठ में बहुत तेज खुजली हो रही हो और उसे खुजाने के लिए आपका अपना हाथ काम न आये, लेकिन भगवन का शुक्र उसी समय कोई दिख जाये और वह आपके पीठ को आपके कहने पर वहीँ-वहीँ खुजा दे | आ..हा.हा...कितना सुखद अनुभव होता है न |  सच में वह भी परमानन्द का एक क्षण होता है | वैसा ही परमानन्द हिंदी ब्लागिंग करते हुए आता है | मुझे हिंदी ब्लागिंग के दुनिया में आये बस चार साल हुआ है | लेकिन इस चार साल का जो अनुभव है वो गजब का है | भई, इतना आनंद सायद ही कहीं मिले | इसीलिए ये ब्लागिंग अपने लिए परमानन्द की बात हो गई है | यदि गूगल टॉक पर आप आनलाइन दिख गए तो आपकी खैरियत नहीं, आपके स्क्रीन पर नीचे दाहिनी तरफ एक लिंक लिया हुआ बाक्स हाजिर हो जायेगा | ये बाक्स किसी को खुजली होने का संकेत है | अब आप अपना काम-धाम छोड़िए और और उन्हें खुजाने के लिए उस लिंक पर अपने माउस को क्लीक करिए | यदि आपने अनसुना किया तो भी खैरियत नहीं है | अगले कुछ मिनटों में आपसे एक सवाल करता हुआ वह बाक्स फिर हाजिर है " भई साहब देखा क्या कैसा लिखा मैंने ? माँ-बहन कर दी मैंने तो .........सब कह दिया, बिना गाली दिए हुए ही ! आपका कमेन्ट नहीं मिला ? इंतज़ार कर रहा हूँ |'' अब आप भी सोचने लगे, ये मुसीबत हते कैसे ? चलो चल कर खुजा ही देता हूँ | न जाने कब अपने को भी खुजली हो | और फिर सामाजिकता भी तो कोई चीज है | चलकर बिना पढ़े एक लाइक,और एक छोटा सा कमेन्ट कर दिया आपने और आ गए वापस अपने काम पर | आप माँ ही माँ सोच रहे थे कि थैंक्यू-वैंक्यू जैसा शब्द उसी बाक्स के माध्यम से मिलने ही वाला होगा | लेकिन मुसीबत और बढ़ गई | बाक्स संदेसा तो लाया लेकिन थैंक्यू-वैंक्यू कुछ नहीं, ऊपर से एक श़क वाला सवाल लेकर हाजिर हुआ " भई साहब ! आपने तो पढ़ा होगा, वो फलाने के माँ-बहन कि जो मै लिखा उसमें आपको कितनी सच्चाई लगती है, मतलब लोग तो इसे सच मानेंगे न ! क्यों कि हकीकत में कोई माँ-बहन करने वाली बात थी नहीं, मैंने तो इसलिए कर दिया कि अपने लोगों को अच्छा लगे और फिर मुझे भी तो अपनी पहचान बनानी है, सो बिना गलियाए तो ये सब होता नहीं, ऐसा आप पुराने लिख्खाड भी कहते है |'' मैंने कुछ गलत तो नहीं लिखा न भई साहब ? आप भी सोच में पड़ गए ! इतना सही खुजाया था फिर इसकी खुजली गई क्यूँ नहीं ! लेकिन फिर आपको ध्यान आया कि जब ये भाई आपके कहने पर आपको खुजाने आया था तो उसने सब जगह खुजाया, जहां-जहां आपने खुजाने को कहा | फिर आपका भी फर्ज बनता है कि आप भी उनके संतुष्टि तक खुजाते रहिये | ये बिरादरी धर्म है सो निभाना ही हितकर है | नहीं तो यही जाकर दस जगह कह देगा कि फलां को बहुत खुजली होती है और फलां मुझे बुला-बुला कर खुजवाता है | आप भी उनके दिए सभी लिंक पर अच्छे से खुजा दिया | ब्लाग,फेसबुक,फलाना डाट कोम, धिम्काना डाट कोम सब पर लाइक, सेयर कमेन्ट | अब जिस भाई को आपने खुजाया उसने भी सभी जगह आपके खुजाने से ज्यादा वहाँ आपके प्रशंसा में तेल लगाया | आनंद आ गया | भई, परमानन्द कि प्राप्ति हो गई |
                              अपने अन्दर नेता बनने की इक्षा समुद्र में उठाने वाले ज्वार-भांटा के तरह हर पूर्णिमा-अमावस की तरंगों से कम नहीं होती होंगी, यदि हम हिंदी ब्लागिंग में सक्रिय हैं | हिंदी ब्लागिंग जगत का पूर्णिमा और अमावस कभी भी हो सकता है , जब दुबे जी और चौबे जी की इक्षा हो | पिछले दिनों चौबे जी का समर्थन किया हुआ एक पत्र दुबे जी ने मेल से भेजा | बड़ी प्रशन्नता हुई | वही ज्वार-भांटा जैसा उमंग | दुबे जी ने लिखा  " प्रिय पाठक जी, सादर ............| वैसे तो हम सब दिन में कई बार लाइक कमेन्ट और सेयर करने हेतु एक दुसरे से बात कर ही लेते हैं, लेकिन कुछ बात ओफिसियल जैसा दिखना चाहिए इसीलिए यह मेल आपको भेजा है | चौबे जी,शर्मा जी,वर्मा जी,गुप्ता जी और झा जी के बहुत कहने पर हमने एक सम्मलेन करने का निर्णय लिया है | हम सभी ब्लागर एकमत होकर किसी विषय पर लिखें और सामाजिक-राजनीतिक मुद्दे पर एकमत रहें, यही अपना उद्येश्य है | अपने को बड़ी प्रसन्नता हुई कि कहीं तो मंच,माला और माइक का साथ मिलेगा | विचारों के ज्वार-भांटा में एक विचार ऐसा आया कि दुबे जी से पहले ही पूछ लूँ  कि मुझे  कोई भाषण-वाषण तैयार करके आना है क्या ? यह विचार इसलिए, क्यों कि मेरे लिए भी कोई बड़ा पद दुबे जी ने रखा होगा और उसकी जब घोषणा होगी तो मेरा मान-सम्मान होगा और उसके बाद दो शब्द तो बोलना पड़ेगा न ! पूछना कुछ ठीक नहीं लगा, सो दुबे जी के आदेश मात्र को सम्मान मानकर निश्चित-समय और स्थान पर पहुँच गया | मन गदगद हो गया | सबका दर्शन हुआ | तिवारी जी को तो अभी तक ब्लॉग के फोटो में ही देखा था और उनकी लेखनी पढ़ी थी, लेकिन सम्मलेन में पहुंचकर पता चला कि तिवारी जी खुद काम लिखते हैं, कट-कापी-पेस्ट ज्यादा करते हैं | तिवारी जी के इस सच्चाई का पता कई लोगों को चला | रायपुर,भोपाल,पटना,दिल्ली,लखनऊ सब जगह से लिख्खाड़ बंधू पहुंचे  | इसीलिए इसका नाम अखिल भारतीय कुशाग्र बुद्धि ब्लागर सम्मलेन रखा गया | एक सवाल समझ से बाहर हो रहा था कि इनका अखिल भारत इन्ही पाँचों राज्यों को मिलकर है तो  भारत के अन्य क्षेत्रों के हिंदी ब्लागरों का प्रतिनिधित्व कैसे होगा ! अपने दिमाग में भी कुछ ज्यादा सवाल आता है | छोड़ो इन सब बातों को अपना पद मिल जाय मंच-माला-माइक और दो शब्द रखने का समय | बिना मतलब की बातों में कौन पड़े | कोई शुल्क नहीं, आने-जाने का टिकट पहले से दिया जा चुका था और व्यवस्था टॉप | सम्मलेन का श्री गणेश और इतिश्री भी हो गया | आखिर दुबे जी ने हमें बुलाया क्यूँ था ? जब अपना कोई स्थान ही नहीं है यहाँ ! मन शांत किया और वहीँ प्रण किया भई अब अपने प्रयाश से एक सम्मलेन करना है | अगली बार अपन भी वैसा ही किया जैसा बाकियों ने अपने साथ किया था | स्थानीय पार्टी ने अपने को बड़ा प्रभावी व्यक्ति माना | सम्मलेन का सारा खर्च मिल गया | अब अपना ब्लाग भी छपता है | लेकिन बिरादरी के इस व्यवस्था को आगे बढ़ाने में बड़ा मजा आता है | अपने तरह का यही एक ऐसा चाकरी है जिसमें परमानन्द मिलता है | ऐसा बर्मा जी और कई कुमार जी भी कहते हैं | जो नहीं कहते वो भी मन ही मन इसकी पुष्टि करते हैं | हिंदी ब्लागिंग अमर रहे |     

राजीव पाठक